बहारें अब नहीं आती फ़िज़ाओं में
ख़िज़ाँ फैली है यूँ चारो दिशाओं में
ये रा'नाई नहीं भाती मेरे दिल को
पड़ा रहता हूँ मैं अक्सर ख़लाओं में
करूँ क्या जी नहीं लगता कहीं पर भी
असर ऐसा है उस की बद्दुआओं में
ख़ुशी का वास्ता भी ज़िंदगी से क्या
हँसी आती नहीं अब कल्पनाओं में
हँसा है आज भी ये रास्ता मुझ पर
वही हैं तल्ख़ियाँ अब भी हवाओं में
किसी की आँख में जो नूर था 'मोहित'
नहीं है अब वो सूरज की शुआओं में
— Mohit Dixit















