ik raaz hai jo mujhpe abhii tak khula nahin | इक राज़ है जो मुझपे अभी तक खुला नहीं

  - Mohit Dixit

इक राज़ है जो मुझपे अभी तक खुला नहीं
उसको किसी से 'इश्क़ हुआ भी है या नहीं

उसकी हथेलियों पे ज़रा ग़ौर तो करो
उन
में निशाँ कहीं भी किसी हाथ का नहीं

वो जानता है लोग उसे पूजते भी हैं
ता'रीफ़ वो करो जो ख़ुद उसको पता नहीं

वो इक मुक़द्दस आग है जिस
में जले हैं सब
सब यानी सब के सब कोई भी बच सका नहीं

उस आग में जले हुओं का हाल क्या कहूँ
वो आग जिस सेे बनना था सूरज बना नहीं

अपनी बनाई सोच में रहकर न सोच उसे
उस जैसा इस जहाँ में कोई दूसरा नहीं

कितनी अजीब बात है ये भी कि मैं उसे
वैसे तो चाहता हूँ मगर चाहता नहीं

'मोहित' हर एक शख़्स हुआ उसकी शक्ल पर
और शक्ल पर ही रुक गया दिल तक गया नहीं

  - Mohit Dixit

Ulfat Shayari

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