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फिर एक रोज़ खुला दिल का ख़ाली-पन हमपे
लगा कि इतनी बुरी शय न थी उदासी भी
लगा कि इतनी बुरी शय न थी उदासी भी
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ये रा'नाई नहीं भाती मेरे दिल को
पड़ा रहता हूँ मैं अक्सर ख़लाओं में
करूँ क्या जी नहीं लगता कहीं पर भी
असर ऐसा है उस की बद्दुआओं में
ख़ुशी का वास्ता भी ज़िंदगी से क्या
हँसी आती नहीं अब कल्पनाओं में
हँसा है आज भी ये रास्ता मुझ पर
वही हैं तल्ख़ियाँ अब भी हवाओं में
किसी की आँख में जो नूर था 'मोहित'
नहीं है अब वो सूरज की शुआओं में
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हम ने इक ज़ख़्म को बचपन से हरा रक्खा है
उस की तस्वीर को सीने से लगा रक्खा है
उस की तस्वीर को सीने से लगा रक्खा है
इस लिए भी न कही बात कभी दिल की उसे
दिल वो देखेगा नहीं बात में क्या रक्खा है
नींद में भूल गया उस ने बुझाया न दिया
हम नहीं सोए कि खिड़की पे दिया रक्खा है
आस में कितने परिंदे हैं उसे इल्म नहीं
आज भी पेड़ के नीचे वो घड़ा रक्खा है
एक लड़की है फ़क़त एक ही लड़की मेरे दोस्त
शहर के शहर को दीवाना बना रक्खा है
वो ही देता है मेरे ग़म के शजर को पानी
मैं ने जिस शख़्स को आँखों में बसा रक्खा है
हम को मालूम है 'मोहित' वो नहीं आएगा
हम ने जिस के लिए दरवाज़ा खुला रक्खा है
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