hamne ik zakham ko bachpan se haraa rakha hai | हमने इक ज़ख़्म को बचपन से हरा रक्खा है

  - Mohit Dixit

हमने इक ज़ख़्म को बचपन से हरा रक्खा है
उसकी तस्वीर को सीने से लगा रक्खा है

इसलिए भी न कही बात कभी दिल की उसे
दिल वो देखेगा नहीं बात में क्या रक्खा है

नींद में भूल गया उसने बुझाया न दिया
हम नहीं सोए कि खिड़की पे दिया रक्खा है

आस में कितने परिंदे हैं उसे इल्म नहीं
आज भी पेड़ के नीचे वो घड़ा रक्खा है

एक लड़की है फ़क़त एक ही लड़की मेरे दोस्त
शहर के शहर को दीवाना बना रक्खा है

वो ही देता है मेरे ग़म के शजर को पानी
मैंने जिस शख़्स को आँखों में बसा रक्खा है

हमको मालूम है 'मोहित' वो नहीं आएगा
हमने जिसके लिए दरवाज़ा खुला रक्खा है

  - Mohit Dixit

Udasi Shayari

Our suggestion based on your choice

More by Mohit Dixit

As you were reading Shayari by Mohit Dixit

Similar Writers

our suggestion based on Mohit Dixit

Similar Moods

As you were reading Udasi Shayari Shayari