"दिल"
मुझे पता है कि इस के नुक़सान क्या हैं वर्ना
मैं तुम से कहता मुझे मोहब्बत है तुम से जानाँ
कभी किसी दिन मेरी मोहब्बत में
कितनी शिद्दत है आज़मा लो
मैं तुम से कहता कि राह-ए-उल्फ़त में
तुम मुझे हम-सफ़र बना लो
मगर मेरी जाँ मुझे पता है
कि राह-ए-उल्फ़त पे जो गया हो
वो कैसी हालत में लौटता है
मुझे पता है किसी से मिल कर
बिछड़ने का दुख बहुत बुरा है
मैं पढ़ चुका हूँ ये जो मोहब्बत है
इस की क़िस्मत में क्या लिखा है
तमाम दुनिया ये जानती है
दिया मोहब्बत का
जब से दुनिया है जल रहा है
मगर मेरी जाँ किसे ख़बर है
कि इस दिए में अज़ल से अब तक
जो जल रहा है वो तेल क्या है
मुझे पता है















