ज़ेहन-ओ-दिल में मेरे पेच है इक फँसी तुझ को जाना है तो जा चला जा अभीइश्क़ है तुझ से या है महज़ दिल-लगी तुझ को जाना है तो जा चला जा अभीये तअल्लुक़ भी आसाँ नहीं हम-सफ़र मोड़ आने हैं आएँगे आगे मगरघर पलटने का ये मोड़ है आख़िरी तुझ को जाना है तो जा चला जा अभी— Mohit Dixit