"ज़िंदगी और चले"

शाम को तारे कभी गिनते हुए या
देख कर के ख़ूब-सूरत सी सहर को

राह पे यूँ ही कभी चलते हुए या
याद कर के ज़िंदगी भर के सफ़र को

जिस जगह जिस मोड़ पर तुम को लगेगा
वक़्त थम जाए इसी पल में यहीं पे

ठहर जाए दिन निकलना, शाम ढलना
और मौसम का बदलना भी वहीं पे

बस वही पल है जहाँ जी भर जिए तुम
सिर्फ़ ज़िंदा ही रहे बाक़ी सभी दिन

ख़याल अच्छा है कि थम जाए समाँ ये
पर हक़ीक़त में नहीं ये बात मुमकिन

ठहर जाना वक़्त की फ़ितरत नहीं है
रुक गई जो ज़िंदगी तो ज़िंदगी क्या

वक़्त है रुकता न रूकती ज़िंदगी तो
सोच लो मोहित ठहरना है सही क्या

रुक गए जो उन सभी को भूल कर के
बढ़ रहा है आज का ये दौर आगे

चल जहाँ पर आस्माँ मिलता ज़मीं से
फिर वहाँ से और आगे और आगे

— Mohit Dixit

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