“अँधेरा”
जाने किस की तलाश में थे हम
जाने किस रास्ते को जाते थे
हर तरफ़ हर जगह अँधेरा था
थोड़े जुगनू से टिमटिमाते थे
सोचते थे कि रौशनी होगी
ये अँधेरा भला है कब तक का
फिर कहीं ये पता चला हम को
चाँद जो जगमगाता दिखता है
बात सच है मगर है आधी सच
चाँद के पीछे बस अँधेरा है
वो अँधेरा जो ख़त्म होता नहीं
वो अँधेरा जो है सदा के लिए
और वहाँ रौशनी की उम्मीदें
बस ख़यालों में पूरी होती हैं
हम भी ऐसे ही रास्ते पे थे
जिस की मंज़िल फ़क़त ख़याली थी
जिस का मिलना था यारों नामुमकिन
जब तलक जान पाए ये आक़िब
पीछे जाने का हौसला न रहा
आगे बढ़ना भी अब है बेमानी
अब भटकते हैं बस अँधेरे में
और बस इंतिज़ार करते हैं
उस कहानी के ख़त्म होने का
जिस के पन्नों पे कुछ लिखा ही नहीं
क्या ये पन्ने सफ़ेद पन्ने नहीं
क्या ये पन्ने सियाह पन्ने हैं
या ये मुझ को सियाह दिखते हैं















