तुम्हारी यादों के मैं आस-पास बैठा हूँ
इसीलिए तो सफ़र में उदास बैठा हूँ
न जान पाएँगे चेहरे से जानने वाले
छिपाए ख़ुद में ही इक ग़म-शनास बैठा हूँ
गले लगाने का मन था कि जिसको वर्षों से
वो मिलने आया है तो बद-हवा से बैठा हूँ
ये तरबियत में नहीं है सो पी नहीं सकता
ये दोस्ती है कि पकड़े गिलास बैठा हूँ
कि शाहज़ादी गुलामों की तो नहीं होती
मैं जानता हूँ मगर लेके आस बैठा हूँ
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