जाने कैसी कश्मकश है ज़िन्दगी में
एक ग़म बैठा है मेरी हर ख़ुशी में
इस उजाले से घुटन होने लगी है
ले चलो मुझको कहीं अब तीरगी में
इक परिंदा टूटकर बिखरा पड़ा है
शक है लोगों को कि टूटा है सही में
ज़हर खा कर शख़्स वो भी मर चुका है
और क्या करता है बंदा बेबसी में
जब ज़रूरत थी उसे यारों की अपने
कौन था तब साथ उसके उस घड़ी में
ख़ुद का दुख लगता है सबको सब सेे ज़्यादा
बस यही है बात कॉमन हम सभी में
मन की बातें अब भी तुम गर कह न पाए
क्या मज़ा है यार ऐसी शा'इरी में
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