jaane kaisi kashmakash hai zindagi men | जाने कैसी कश्मकश है ज़िन्दगी में

  - Aqib khan

जाने कैसी कश्मकश है ज़िन्दगी में
एक ग़म बैठा है मेरी हर ख़ुशी में

इस उजाले से घुटन होने लगी है
ले चलो मुझको कहीं अब तीरगी में

इक परिंदा टूटकर बिखरा पड़ा है
शक है लोगों को कि टूटा है सही में

ज़हर खा कर शख़्स वो भी मर चुका है
और क्या करता है बंदा बेबसी में

जब ज़रूरत थी उसे यारों की अपने
कौन था तब साथ उसके उस घड़ी में

ख़ुद का दुख लगता है सबको सब सेे ज़्यादा
बस यही है बात कॉमन हम सभी में

मन की बातें अब भी तुम गर कह न पाए
क्या मज़ा है यार ऐसी शा'इरी में

  - Aqib khan

Jashn Shayari

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