Hafeez Hoshiarpuri

Hafeez Hoshiarpuri

@hafeez-hoshiarpuri

Hafeez Hoshiarpuri shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Hafeez Hoshiarpuri's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

कोई शरीक-ए-ग़म नहीं अब तिरी याद के बग़ैर कोई अनीस-ए-दिल नहीं अब तिरे नाम के सिवा — Hafeez Hoshiarpuri
कहीं ये तर्क-ए-मोहब्बत की इब्तिदा तो नहीं वो मुझ को याद कभी इस क़दर नहीं आए — Hafeez Hoshiarpuri
कब मिलती है ये दौलत-ए-बेदार किसी को और मैं हूँ कि रोना है इसी दीदा-वरी का — Hafeez Hoshiarpuri
दोस्ती आम है लेकिन ऐ दोस्त दोस्त मिलता है बड़ी मुश्किल से — Hafeez Hoshiarpuri
टूटते जाते हैं रिश्ते जोड़ता जाता हूँ मैं एक मुश्किल कम हुई और एक मुश्किल आ गई — Hafeez Hoshiarpuri
ख़ुद अपनी गुम-शुदगी से जिन्हें शिकायत है तू ही बता उन्हें तेरा निशाँ कहाँ से मिले — Hafeez Hoshiarpuri
कोई मौक़ा ज़िंदगी का आख़िरी मौक़ा नहीं इस क़दर ताजील क्यूँ रफ़-ए-कुदूरत के लिए — Hafeez Hoshiarpuri
मोहब्बत करने वाले कम न होंगे तिरी महफ़िल में लेकिन हम न होंगे — Hafeez Hoshiarpuri

Ghazal

फिर से आराइश-ए-हस्ती के जो सामाँ होंगे तेरे जल्वों ही से आबाद शबिस्ताँ होंगे इश्क़ की मंज़िल-ए-अव्वल पे ठहरने वालो इस से आगे भी कई दश्त-ओ-बयाबाँ होंगे तू जहाँ जाएगी ग़ारत-गर-ए-हस्ती बन कर हम भी अब साथ तिरे गर्दिश-ए-दौराँ होंगे किस क़दर सख़्त है ये तर्क-ओ-तलब की मंज़िल अब कभी उन से मिले भी तो पशेमाँ होंगे तेरे जल्वों से जो महरूम रहे हैं अब तक वही आख़िर तिरे जल्वों के निगहबाँ होंगे अब तो मजबूर हैं पर हश्र का दिन आने दे तुझ से इंसाफ़-तलब रू-ए-गुरेज़ाँ होंगे जब कभी हम ने किया इश्क़ पशेमान हुए ज़िंदगी है तो अभी और पशेमाँ होंगे कोई भी ग़म हो ग़म-ए-दिल कि ग़म-ए-दहर 'हफ़ीज़' हम ब-हर-हाल ब-हर-रंग ग़ज़ल-ख़्वाँ होंगे — Hafeez Hoshiarpuri
नर्गिस पे तो इल्ज़ाम लगा बे-बसरी का अरबाब-ए-गुलिस्ताँ पे नहीं कम-नज़री का तौफ़ीक़-ए-रिफ़ाक़त नहीं उन को सर-ए-मंज़िल रस्ते में जिन्हें पास रहा हम-सफ़री का अब ख़ानका ओ मदरसा ओ मय-कदा हैं एक इक सिलसिला है क़ाफ़िला-ए-बे-ख़बरी का हर नक़्श है आईना-ए-नैरंग-ए-तमाशा दुनिया है कि हासिल मिरी हैराँ-नज़री का अब फ़र्श से ता-अर्श ज़बूँ-हाल है फ़ितरत इक म'अरका दर-पेश है अज़्म-ए-बशरी का कब मिलती है ये दौलत-ए-बेदार किसी को और मैं हूँ कि रोना है इसी दीदा-वरी का बे-वासता-ए-इश्क़ भी रंग-ए-रुख़-ए-परवेज़ उनवान है फ़रहाद की ख़ूनीं-जिगरी का आख़िर तिरे दर पे मुझे ले आई मोहब्बत देखा न गया हाल मिरी दर-बदरी का दिल में हो फ़क़त तुम ही तुम आँखों पे न जाओ आँखों को तो है रोग परेशाँ-नज़री का बे-पैरवी-ए-'मीर' 'हफ़ीज़' अपनी रविश है हम पर कोई इल्ज़ाम नहीं कम-हुनरी का — Hafeez Hoshiarpuri
ग़म-ए-आफ़ाक़ है रुस्वा ग़म-ए-दिल-बर बन के तोहमत-ए-इश्क़ लगी हम पे सुख़न-वर बन के वो नहीं मौत सही मौत नहीं नींद सही कोई आ जाए शब-ए-ग़म का मुक़द्दर बन के राहबर तुम को बनाया हमें मालूम न था राह-रौ राह भटक जाते हैं रहबर बन के इस ज़ियाँ-ख़ाने में इक क़तरे पे क्या क्या गुज़री कभी आँसू कभी शबनम कभी गौहर बन के मौत की नींद के मातों पे न क्यूँँ रश्क आए जागना है उन्हें हंगामा-ए-मशहर बन के याद फिर आ गईं भूली हुई बातें क्या क्या फिर मुलाक़ात हुई ऐसे मुक़द्दर बन के आह ये उक़्दा-ए-ग़म बज़्म-ए-तरब में भी 'हफ़ीज़' बार-हा आँख छलक जाती है साग़र बन के — Hafeez Hoshiarpuri
लफ़्ज़ अभी ईजाद होंगे हर ज़रूरत के लिए शरह-ए-राहत के लिए ग़म की सराहत के लिए अब मिरा चुप-चाप रहना अम्र-ए-मजबूरी सही मैं ने खोली ही ज़बाँ कब थी शिकायत के लिए मेरे चश्म-ओ-गोश-ओ-लब से पूछ लो सब कुछ यहीं मुझ को मेरे सामने लाओ शहादत के लिए सख़्त-कोशी सख़्त-जानी की तरफ़ लाई मुझे मुझ को ये फ़ुर्सत ग़नीमत है अलालत के लिए ऑक्सीजन से शबिस्तान-ए-अनासिर ताबनाक मुज़्तरिब हर ज़ी-नफ़स उस की रिफ़ाक़त के लिए मर गए कुछ लोग जीने का मुदावा सोच कर और कुछ जीते रहे जीने की आदत के लिए आह मर्ग-ए-आदमी पर आदमी रोए बहुत कोई भी रोया न मर्ग-ए-आदमियत के लिए कोई मौक़ा ज़िंदगी का आख़िरी मौक़ा नहीं इस क़दर ताजील क्यूँ रफ़-ए-कुदूरत के लिए इस्तक़ामत ऐ मिरे दैर-आश्ना-ए-ग़म-गुसार एक आँसू है बहुत हुस्न-ए-नदामत के लिए कोई 'नासिर' की ग़ज़ल कोई ज़फ़र की मय-तरंग चाहिए कुछ तो मिरी शाम-ए-अयादत के लिए गुलशन-आबाद-ए-जहाँ में सूरत-ए-शबनम 'हफ़ीज़' हम अगर रोए भी तो रोने की फ़ुर्सत के लिए — Hafeez Hoshiarpuri
अब कोई आरज़ू नहीं शौक़-ए-पयाम के सिवा अब कोई जुस्तुजू नहीं शौक़-ए-सलाम के सिवा कोई शरीक-ए-ग़म नहीं अब तिरी याद के बग़ैर कोई अनीस-ए-दिल नहीं अब तिरे नाम के सिवा तेरी निगाह-ए-मस्त से मुझ पे ये राज़ खुल गया और भी गर्दिशें हैं कुछ गर्दिश-ए-जाम के सिवा ख़्वाहिश-ए-आरज़ू सही हासिल-ए-ज़िंदगी मगर हासिल-ए-आरज़ू है क्या सोज़-ए-मुदाम के सिवा आह कोई न कर सका चारा-ए-तल्ख़ी-ए-फ़िराक़ नाला-ए-सुब्ह के बग़ैर गिर्या-ए-शाम के सिवा रंग-ए-बहार पर न भूल बू-ए-चमन से दर-गुज़र ये भी हैं ख़ुश-नुमा फ़रेब दाना-ओ-दाम के सिवा मर के हयात-ए-जाविदाँ इश्क़ को मिल गई 'हफ़ीज़' जी के हवस को क्या मिला मर्ग-ए-दवाम के सिवा — Hafeez Hoshiarpuri
कुछ इस तरह से नज़र से गुज़र गया कोई कि दिल को ग़म का सज़ा-वार कर गया कोई दिल-ए-सितम-ज़दा को जैसे कुछ हुआ ही नहीं ख़ुद अपने हुस्न से यूँँ बे-ख़बर गया कोई वो एक जल्वा-ए-सद-रंग इक हुजूम-ए-बहार न जाने कौन था जाने किधर गया कोई नज़र कि तिश्ना-ए-दीदार थी रही महरूम नज़र उठाई तो दिल में उतर गया कोई निगाह-ए-शौक़ की महरूमियों से ना-वाक़िफ़ निगाह-ए-शौक़ पे इल्ज़ाम धर गया कोई अब उन के हुस्न में हुस्न-ए-नज़र भी शामिल है कुछ और मेरी नज़र से सँवर गया कोई किसी के पाँव की आहट कि दिल की धड़कन थी हज़ार बार उठा सू-ए-दर गया कोई नसीब-ए-अहल-ए-वफ़ा ये सुकून-ए-दिल तो न था ज़रूर नाला-ए-दिल बे-असर गया कोई उठा फिर आज मिरे दिल में रश्क का तूफ़ाँ फिर उन की राह से बा-चश्म-ए-तर गया कोई ये कह के याद करेंगे 'हफ़ीज़' दोस्त मुझे वफ़ा की रस्म को पाइंदा कर गया कोई — Hafeez Hoshiarpuri
कहाँ कहाँ न तसव्वुर ने दाम फैलाए हुदूद-ए-शाम-ओ-सहरस निकल के देख आए नहीं पयाम रह-ए-नामा-ओ-पयाम तू है अभी सबास कहो उन के दिल को बहलाए ग़ुरूर-ए-जादा-शनासी बजा सही लेकिन सुराग़-ए-मंज़िल-ए-मक़्सूद भी कोई पाए ख़ुदा वो दिन न दिखाए कि राहबर ये कहे चले थे जाने कहाँ से कहाँ निकल आए गुज़र गया कोई दरमाँदा-राह ये कहता अब इस फ़ज़ा में कोई क़ाफ़िले न ठहराए न जाने उन के मुक़द्दर में क्यूँँ है तीरा-शबी वो हम-नवा जो सहर को क़रीब-तर लाए कोई फ़रेब-ए-नज़र है कि ताबनाक फ़ज़ा किसे ख़बर कि यहाँ कितने चाँद गहनाए ग़म-ए-ज़माना तिरी ज़ुल्मतें ही क्या कम थीं कि बढ़ चले हैं अब उन गेसुओं के भी साए बहुत बुलंद है इस से मिरा मक़ाम-ए-ग़ज़ल अगरचे मैं ने मोहब्बत के गीत भी गाए 'हफ़ीज़' अपना मुक़द्दर 'हफ़ीज़' अपना नसीब गिरे थे फूल मगर हम ने ज़ख़्म ही खाए — Hafeez Hoshiarpuri
ऐसी भी क्या जल्दी प्यारे जाने मिलें फिर या न मिलें हम कौन कहेगा फिर ये फ़साना बैठ भी जाओ सुन लो कोई दम वस्ल की शीरीनी में पिन्हाँ हिज्र की तल्ख़ी भी है कम कम तुम से मिलने की भी ख़ुशी है तुम से जुदा होने का भी ग़म हुस्न-ओ-इश्क़ जुदा होते हैं जाने क्या तूफ़ान उठेगा हुस्न की आँखें भी हैं पुर-नम इश्क़ की आँखें भी हैं पुर-नम मेरी वफ़ा तो नादानी थी तुम ने मगर ये क्या ठानी थी काश न करते मुझ से मोहब्बत काश न होता दिल का ये आलम परवाने की ख़ाक परेशाँ शम्अ' की लौ भी लर्ज़ां लर्ज़ां महफ़िल की महफ़िल है वीराँ कौन करे अब किस का मातम कुछ भी हो पर इन आँखों ने अक्सर ये आलम भी देखा इश्क़ की दुनिया नाज़-ए-सरापा हुस्न की दुनिया इज्ज़-ए-मुजस्सम शहद-शिकन होंटों की लर्ज़िश इशरत बाक़ी का गहवारा दायरा-ए-इम्कान-ए-तमन्ना नर्म लचकती बाँहों के ख़म अपने अपने दिल के हाथों दोनों ही बर्बाद हुए हैं मैं हूँ और वफ़ा का रोना वो हैं और जफ़ा का मातम नाकामी सी नाकामी है महरूमी सी महरूमी है दिल का मनाना सई-ए-मुसलसल उन को भुलाना कोशिश-ए-पैहम अहद-ए-वफ़ा है और भी मोहकम तेरी जुदाई के मैं क़ुर्बां तेरी जुदाई के मैं क़ुर्बां अहद-ए-वफ़ा है और भी मोहकम — Hafeez Hoshiarpuri
राज़-ए-सर-बस्ता मोहब्बत के ज़बाँ तक पहुँचे बात बढ़ कर ये ख़ुदा जाने कहाँ तक पहुँचे क्या तसर्रुफ़ है तिरे हुस्न का अल्लाह अल्लाह जल्वे आँखों से उतर कर दिल-ओ-जाँ तक पहुँचे तिरी मंज़िल पे पहुँचना कोई आसान न था सरहद-ए-अक़्ल से गुज़रे तो यहाँ तक पहुँचे हैरत-ए-इश्क़ मिरी हुस्न का आईना है देखने वाले कहाँ से हैं कहाँ तक पहुँचे खुल गया आज निगाहें हैं निगाहें अपनी जल्वे ही जल्वे नज़र आए जहाँ तक पहुँचे वही इस गोशा-ए-दामाँ की हक़ीक़त जाने जो मिरे दीदा-ए-ख़ूँनाबा-फ़िशाँ तक पहुँचे इब्तिदा में जिन्हें हम नंग-ए-वफ़ा समझे थे होते होते वो गिले हुस्न-ए-बयाँ तक पहुँचे आह वो हर्फ़-ए-तमन्ना कि न लब तक आए हाए वो बात कि इक इक की ज़बाँ तक पहुँचे किस का दिल है कि सुने क़िस्सा-ए-फ़ुर्क़त मेरा कौन है जो मिरे अंदोह-ए-निहाँ तक पहुँचे खलिश-अंगेज़ था क्या क्या तिरी मिज़्गाँ का ख़याल टूट कर दिल में ये नश्तर रग-ए-जाँ तक पहुँचे न पता संग-ए-निशाँ का न ख़बर रहबर की जुस्तुजू में तिरे दीवाने यहाँ तक पहुँचे न ग़ुबार-ए-रह-ए-मंज़िल है न आवाज़-ए-जरस कौन मुझ रहरव-ए-गुम-कर्दा-निशाँ तक पहुँचे साफ़ तौहीन है ये दर्द-ए-मोहब्बत की 'हफ़ीज़' हुस्न का राज़ हो और मेरी ज़बाँ तक पहुँचे — Hafeez Hoshiarpuri