nargis pe to ilzaam laga be-basri ka | नर्गिस पे तो इल्ज़ाम लगा बे-बसरी का

  - Hafeez Hoshiarpuri

नर्गिस पे तो इल्ज़ाम लगा बे-बसरी का
अरबाब-ए-गुलिस्ताँ पे नहीं कम-नज़री का

तौफ़ीक़-ए-रिफ़ाक़त नहीं उन को सर-ए-मंज़िल
रस्ते में जिन्हें पास रहा हम-सफ़री का

अब ख़ानका ओ मदरसा ओ मय-कदा हैं एक
इक सिलसिला है क़ाफ़िला-ए-बे-ख़बरी का

हर नक़्श है आईना-ए-नैरंग-ए-तमाशा
दुनिया है कि हासिल मिरी हैराँ-नज़री का

अब फ़र्श से ता-अर्श ज़बूँ-हाल है फ़ितरत
इक म'अरका दर-पेश है अज़्म-ए-बशरी का

कब मिलती है ये दौलत-ए-बेदार किसी को
और मैं हूँ कि रोना है इसी दीदा-वरी का

बे-वासता-ए-इश्क़ भी रंग-ए-रुख़-ए-परवेज़
उनवान है फ़रहाद की ख़ूनीं-जिगरी का

आख़िर तिरे दर पे मुझे ले आई मोहब्बत
देखा न गया हाल मिरी दर-बदरी का

दिल में हो फ़क़त तुम ही तुम आँखों पे न जाओ
आँखों को तो है रोग परेशाँ-नज़री का

बे-पैरवी-ए-'मीर' 'हफ़ीज़' अपनी रविश है
हम पर कोई इल्ज़ाम नहीं कम-हुनरी का

  - Hafeez Hoshiarpuri

Bimar Shayari

Our suggestion based on your choice

More by Hafeez Hoshiarpuri

As you were reading Shayari by Hafeez Hoshiarpuri

Similar Writers

our suggestion based on Hafeez Hoshiarpuri

Similar Moods

As you were reading Bimar Shayari Shayari