kabhi to nasl-o-watan-parasti ki teergi ko shikast hogi | कभी तो नस्ल-ओ-वतन-परस्ती की तीरगी को शिकस्त होगी

  - Abul mujahid zaid

कभी तो नस्ल-ओ-वतन-परस्ती की तीरगी को शिकस्त होगी
कभी तो शाम-ए-अलम मिटेगी कभी तो सुब्ह-ए-ख़ुशी मिलेगी

  - Abul mujahid zaid

Raat Shayari

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    भूला नहीं हूँ आज भी हालात गाँव के
    हाँ, शहर आ गया हूँ मगर साथ गाँव के

    दुनिया में मेरा नाम जो रोशन हुआ अगर
    जलने लगेंगे बल्ब भी हर रात गाँव के
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    Tanoj Dadhich
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    खुलती है मेरी नींद हर इक रात दो बजे
    इक रात दो बजे मुझे छोड़ा था आपने
    Tanoj Dadhich
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    क्या बैठ जाएँ आन के नज़दीक आप के
    बस रात काटनी है हमें आग ताप के

    कहिए तो आप को भी पहन कर मैं देख लूँ
    मा'शूक़ यूँ तो हैं ही नहीं मेरी नाप के
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    शब बसर करनी है, महफ़ूज़ ठिकाना है कोई
    कोई जंगल है यहाँ पास में ? सहरा है कोई ?
    Umair Najmi
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    कल रात मैं बहुत ही अलग सा लगा मुझे
    उसकी नज़र ने यूँ मेरी सूरत खंगाली दोस्त
    Afzal Ali Afzal
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    शब जो होली की है मिलने को तिरे मुखड़े से जान
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    Mushafi Ghulam Hamdani
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    सारी रात लगाकर उसपर नज़्म लिखी
    और उसने बस अच्छा लिखकर भेजा है
    Zahid Bashir
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    Sapna Moolchandani
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    ये ज़ुल्फ़ अगर खुल के बिखर जाए तो अच्छा
    इस रात की तक़दीर सँवर जाए तो अच्छा

    जिस तरह से थोड़ी सी तेरे साथ कटी है
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    बाज़ीचा-ए-अतफ़ाल है दुनिया मिरे आगे
    होता है शब-ओ-रोज़ तमाशा मिरे आगे
    Mirza Ghalib
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