कभी तो नस्ल-ओ-वतन-परस्ती की तीरगी को शिकस्त होगीकभी तो शाम-ए-अलम मिटेगी कभी तो सुब्ह-ए-ख़ुशी मिलेगी— Abul mujahid zaid