लफ़्ज़ अभी ईजाद होंगे हर ज़रूरत के लिए
शरह-ए-राहत के लिए ग़म की सराहत के लिए
अब मिरा चुप-चाप रहना अम्र-ए-मजबूरी सही
मैं ने खोली ही ज़बाँ कब थी शिकायत के लिए
मेरे चश्म-ओ-गोश-ओ-लब से पूछ लो सब कुछ यहीं
मुझ को मेरे सामने लाओ शहादत के लिए
सख़्त-कोशी सख़्त-जानी की तरफ़ लाई मुझे
मुझ को ये फ़ुर्सत ग़नीमत है अलालत के लिए
ऑक्सीजन से शबिस्तान-ए-अनासिर ताबनाक
मुज़्तरिब हर ज़ी-नफ़स उस की रिफ़ाक़त के लिए
मर गए कुछ लोग जीने का मुदावा सोच कर
और कुछ जीते रहे जीने की आदत के लिए
आह मर्ग-ए-आदमी पर आदमी रोए बहुत
कोई भी रोया न मर्ग-ए-आदमियत के लिए
कोई मौक़ा ज़िंदगी का आख़िरी मौक़ा नहीं
इस क़दर ताजील क्यूँ रफ़-ए-कुदूरत के लिए
इस्तक़ामत ऐ मिरे दैर-आश्ना-ए-ग़म-गुसार
एक आँसू है बहुत हुस्न-ए-नदामत के लिए
कोई 'नासिर' की ग़ज़ल कोई ज़फ़र की मय-तरंग
चाहिए कुछ तो मिरी शाम-ए-अयादत के लिए
गुलशन-आबाद-ए-जहाँ में सूरत-ए-शबनम 'हफ़ीज़'
हम अगर रोए भी तो रोने की फ़ुर्सत के लिए
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