khud apni gum-shudgi se jinhen shikaayat hai | ख़ुद अपनी गुम-शुदगी से जिन्हें शिकायत है

  - Hafeez Hoshiarpuri

ख़ुद अपनी गुम-शुदगी से जिन्हें शिकायत है
तू ही बता उन्हें तेरा निशाँ कहाँ से मिले

  - Hafeez Hoshiarpuri

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    राज़-ए-सर-बस्ता मोहब्बत के ज़बाँ तक पहुँचे
    बात बढ़ कर ये ख़ुदा जाने कहाँ तक पहुँचे

    क्या तसर्रुफ़ है तिरे हुस्न का अल्लाह अल्लाह
    जल्वे आँखों से उतर कर दिल-ओ-जाँ तक पहुँचे

    तिरी मंज़िल पे पहुँचना कोई आसान न था
    सरहद-ए-अक़्ल से गुज़रे तो यहाँ तक पहुँचे

    हैरत-ए-इश्क़ मिरी हुस्न का आईना है
    देखने वाले कहाँ से हैं कहाँ तक पहुँचे

    खुल गया आज निगाहें हैं निगाहें अपनी
    जल्वे ही जल्वे नज़र आए जहाँ तक पहुँचे

    वही इस गोशा-ए-दामाँ की हक़ीक़त जाने
    जो मिरे दीदा-ए-ख़ूँनाबा-फ़िशाँ तक पहुँचे

    इब्तिदा में जिन्हें हम नंग-ए-वफ़ा समझे थे
    होते होते वो गिले हुस्न-ए-बयाँ तक पहुँचे

    आह वो हर्फ़-ए-तमन्ना कि न लब तक आए
    हाए वो बात कि इक इक की ज़बाँ तक पहुँचे

    किस का दिल है कि सुने क़िस्सा-ए-फ़ुर्क़त मेरा
    कौन है जो मिरे अंदोह-ए-निहाँ तक पहुँचे

    खलिश-अंगेज़ था क्या क्या तिरी मिज़्गाँ का ख़याल
    टूट कर दिल में ये नश्तर रग-ए-जाँ तक पहुँचे

    न पता संग-ए-निशाँ का न ख़बर रहबर की
    जुस्तुजू में तिरे दीवाने यहाँ तक पहुँचे

    न ग़ुबार-ए-रह-ए-मंज़िल है न आवाज़-ए-जरस
    कौन मुझ रहरव-ए-गुम-कर्दा-निशाँ तक पहुँचे

    साफ़ तौहीन है ये दर्द-ए-मोहब्बत की 'हफ़ीज़'
    हुस्न का राज़ हो और मेरी ज़बाँ तक पहुँचे
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    Hafeez Hoshiarpuri
    हर क़दम पर हम समझते थे कि मंज़िल आ गई
    हर क़दम पर इक नई दरपेश मुश्किल आ गई

    या ख़ला पर हुक्मराँ या ख़ाक के अंदर निहाँ
    ज़िंदगी डट कर अनासिर के मुक़ाबिल आ गई

    बढ़ रहा है दम-ब-दम सुब्ह-ए-हक़ीक़त का यक़ीं
    हर नफ़स पर ये गुमाँ होता है मंज़िल आ गई

    टूटते जाते हैं रिश्ते जोड़ता जाता हूँ मैं
    एक मुश्किल कम हुई और एक मुश्किल आ गई

    हाल-ए-दिल है कोई ख़्वाब-आवर फ़साना तो नहीं
    नींद अभी से तुम को ऐ यारान-ए-महफ़िल आ गई
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    Hafeez Hoshiarpuri
    आज उन्हें कुछ इस तरह जी खोल कर देखा किए
    एक ही लम्हे में जैसे उम्र-भर देखा किए

    दिल अगर बेताब है दिल का मुक़द्दर है यही
    जिस क़दर थी हम को तौफ़ीक़-ए-नज़र देखा किए

    ख़ुद-फ़रोशाना अदा थी मेरी सूरत देखना
    अपने ही जल्वे ब-अंदाज़-ए-दिगर देखा किए

    ना-शनास-ए-ग़म फ़क़त दाद-ए-हुनर देते रहे
    हम मता-ए-ग़म को रुस्वा-ए-हुनर देखा किए

    देखने का अब ये आलम है कोई हो या न हो
    हम जिधर देखा किए पहरों उधर देखा किए

    हुस्न को देखा है मैं ने हुस्न की ख़ातिर 'हफ़ीज़'
    वर्ना सब अपना ही मेयार-ए-नज़र देखा किए
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    Hafeez Hoshiarpuri
    इक उम्र से हम तुम आश्ना हैं
    हम से मह ओ अंजुम आश्ना हैं

    दिल डूबता जा रहा है पैहम
    लब हैं कि तबस्सुम आश्ना हैं

    उन मंज़िलों का सुराग़ कम है
    जिन मंज़िलों में गुम आश्ना हैं

    कुछ चारा-ए-दर्द-ए-आश्नाई
    किस सोच में गुम-सुम आश्ना हैं

    इस दौर में तिश्ना-काम साक़ी
    हम जैसे कई ख़ुम-आश्ना हैं
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    Hafeez Hoshiarpuri
    अब कोई आरज़ू नहीं शौक़-ए-पयाम के सिवा
    अब कोई जुस्तुजू नहीं शौक़-ए-सलाम के सिवा

    कोई शरीक-ए-ग़म नहीं अब तिरी याद के बग़ैर
    कोई अनीस-ए-दिल नहीं अब तिरे नाम के सिवा

    तेरी निगाह-ए-मस्त से मुझ पे ये राज़ खुल गया
    और भी गर्दिशें हैं कुछ गर्दिश-ए-जाम के सिवा

    ख़्वाहिश-ए-आरज़ू सही हासिल-ए-ज़िंदगी मगर
    हासिल-ए-आरज़ू है क्या सोज़-ए-मुदाम के सिवा

    आह कोई न कर सका चारा-ए-तल्ख़ी-ए-फ़िराक़
    नाला-ए-सुब्ह के बग़ैर गिर्या-ए-शाम के सिवा

    रंग-ए-बहार पर न भूल बू-ए-चमन से दर-गुज़र
    ये भी हैं ख़ुश-नुमा फ़रेब दाना-ओ-दाम के सिवा

    मर के हयात-ए-जाविदाँ इश्क़ को मिल गई 'हफ़ीज़'
    जी के हवस को क्या मिला मर्ग-ए-दवाम के सिवा
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    Hafeez Hoshiarpuri

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