chal rahe hain saath men lekar udaasi | चल रहे हैं साथ में लेकर उदासी

  - Aqib khan

चल रहे हैं साथ में लेकर उदासी
जान ले लेता है ये मंज़र उदासी

जिस क़दर इस
में मैं अब डूबा हुआ हूँ
कह भी सकते हो मुझे पैकर उदासी

क्या हुआ गर ख़ुशियाँ हिस्से में नहीं तो
ख़ुश रहो ना मिल रही भर-भर उदासी

आ न जाना ग़म को मेरे दूर करने
देख लेने दो ज़रा जी कर उदासी

मैं अकेला हूँ तिरा हट जाऊँ मैं भी?
पड़ रही हो गर तुझे कमतर उदासी

एक तो हम तेरे ग़म में मुब्तला हैं
है ज़माने भर की भी उसपर उदासी

हम किसे बतलाएँ अब अपनी उदासी
बोलती है चढ़ के अब हर सर उदासी

अच्छा तुम जाओ किसी के साथ हूँ मैं
पकड़े बैठी है मुझे कसकर उदासी

  - Aqib khan

Wahshat Shayari

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