सब दर्द भी झूठे हैं ये ग़म-ख़्वार भी झूठे

अश'आर भी झूठे रहे फ़नकार भी झूठे

दुख में जो दुखी हो गए तो मर्द नहीं हो
ये बात जो कहते हैं वो मक्कार भी झूठे

वो बातें मिलेंगी न वो अब लोग मिलेंगे
झूठी थी कहानी सो थे किरदार भी झूठे

इनको न अलग कीजिए ये रह न सकेंगे
ये फूल भी झूठे हैं जी ये ख़ार भी झूठे

चेहरा ही तो बदला है नहीं बदली है कुर्सी
उस बार भी झूठे थे वो इस बार भी झूठे

— Aqib khan

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