क्या आलम-ए-मोहब्बत इस नौ-बहार में है
    सय्याद भी चमन का बुलबुल के प्यार में है
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    ज़रा खुल के जो मुस्कुराने पे आए
    ज़माने के हम फिर निशाने पे आए

    शहंशाह हो या कोई आम बंदा
    जो चाहे मेरे आस्ताने पे आए

    कहाँ ढूँढते रहनुमा शहर में तुम
    सो हम ख़ुद तुम्हारे ठिकाने पे आए

    उन्हें क्या कहें जिनके सर हो बुलंदी
    उन्हें अक़्ल बस मात खाने पे आए

    पता जब चला बाप की अहमियत का
    जब उनकी तरह हम कमाने पे आए
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    हुए हैं जब से ग़ाएब ख़्वाब आँखों से
    नज़र आता हूँ मैं बे-ताब आँखों से

    डरा सकता नहीं तूफ़ाँ हमें कोई
    के देखे हैं कई सैलाब आँखों से

    ख़िज़ाँ ने जो उजाड़ा है चमन मेरा
    ख़ुदा कर दे उसे शादाब आँखों से

    रुके अश्कों का इक तालाब है मुझ में
    निकल जाए वही तालाब आँखों से

    बताते हैं यही तारीफ़ में उसकी
    हमारा यार है नायाब आँखों से

    तेरे हाथों पिए पानी से भी साक़ी
    नज़र आए कई महताब आँखों से
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    बारिश में अक्सर नाव कागज़ की बनाते थे मियाँ
    इन मौसमों का लुत्फ़ पहले यूॅं उठाते थे मियाँ

    अब खिड़कियों से धूप आती है तो आँखें खुलती हैं
    पहले उजाले से भी जल्दी जाग जाते थे मियाँ

    है मुँह-ज़बानी याद गुज़रे दौर के किस्से हमें
    कैसे कमाते थे कि कैसे घर चलाते थे मियाँ
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    ज़रा ठहरो सुनाने को हसीं नग़्मात बाक़ी हैं
    बयाँ करने को इस दिल के कई जज़्बात बाक़ी हैं

    अभी से चल दिए सुनकर अधूरी दास्ताँ लोगों
    अभी खुलने हमारे क़ीमती सफ़्हात बाक़ी हैं

    अदब, तहज़ीब सब कुछ भूल बैठी हैं नई नस्लें
    न जाने देखने को और क्या हालात बाक़ी हैं

    ज़रा-सी बूँद से गिरने लगा है ये मकाँ मेरा
    अभी सावन के मौसम की कई बरसात बाक़ी हैं
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    अदब, तहज़ीब सब कुछ भूल बैठी है नई नस्लें
    न जाने देखने को ओर क्या हालात बाक़ी हैं
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    "हौसला"
    हौसला रख रास्ते दिखने लगेंगे
    यह अँधेरे सुब्ह तक छटने लगेंगे
    क़ाफ़िले पर क़ाफ़िले गुज़रे यहाँ से
    देखना कुछ नक़्श-ए-पा आगे मिलेंगे
    लड़-खड़ाते हौसलों को फिर उठा कर
    सुब्ह होते ही सफ़र पर चल पड़ेंगे
    ठोकरों से कह दो के दम-ख़म लगा दें
    हम गिरेंगे फिर उठेंगे पर चलेंगे
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    किस तरह ज़ाहिर करें हम चीज़ क्या है ज़िंदगी
    एक पल की दास्ताँ फिर हादिसा है ज़िंदगी

    आप आँखों से मेरी आँखें मिला कर देखिए
    ख़ूबसूरत-सी मगर ज़ालिम बला है ज़िंदगी

    कब किसे बख़्शे इनायत कब किसे बख़्शे सितम
    मेहरबाँ है कुछ पे तो कुछ से ख़फ़ा है ज़िंदगी

    इस तरह होती फ़ना मिलता नहीं नक़्श-ए-वुजूद
    हू-ब-हू पानी का कोई बुलबुला है ज़िंदगी
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    आईना हमें ख़ुद का जब चेहरा दिखाता है
    हर बार हमें ख़ुद की नज़रों में गिराता है

    मुँह फेर के निकले थे क्या सोच के जाएँ अब
    किस मुँह से कहे आख़िर, घर याद वो आता है

    हम छोड़ वतन अपना परदेस में बैठे हैं
    हर रोज़ वतन हमको आवाज़ लगाता है

    ख़ामोश ज़ुबाँ मेरी तब शोर मचाती है
    जब दोस्त नज़र कोई इस शहर में आता है

    दिल भूल जा वो बातें, बातें जो पुरानी हैं
    क्यों अश्क-ए-नदामत से आँखों को भिगाता है
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    "मज़हबी जंग"
    उधर मज़हबी जंग का शोर है
    ख़ुदा मेरा घर भी उसी ओर है
    तबाही का मंंज़र है जाएँ जिधर
    है टूटी इमारत दुकानें सभी
    है पत्थर ही पत्थर फ़क़त राह पर
    कहीं चीख़ ने की सदा है
    कहीं ख़ामुशी का है आलम
    कहीं खूँ से लथपथ पड़ा है कोई
    हैं तलवार हाथों में पकड़े कई
    सितमगर बढ़ाते बग़ावत
    न दैर-ओ-हरम है सलामत
    ज़मीं पर है उतरी क़यामत
    है बिगड़े से हालात अब शहर में
    हुई हैं मियाँ
    कई ज़िंदगी ख़त्म इस बैर में
    फ़ज़ा में मिली है हवा ख़ौफ़ की
    समुंदर लबा-लब है लाशों से ही
    न महफ़ूज़ कोई यहाँ ठौर है
    ये उठता धुआँ और जलता मकाँ
    बताते हैं नफ़रत का यह दौर है
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    MAHESH CHAUHAN NARNAULI
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