10
3 Likes
ज़रा खुल के जो मुस्कुराने पे आए
ज़माने के हम फिर निशाने पे आए
ज़माने के हम फिर निशाने पे आए
शहंशाह हो या कोई आम बंदा
जो चाहे मेरे आस्ताने पे आए
कहाँ ढूँढ़ते रहनुमा शहर में तुम
सो हम ख़ुद तुम्हारे ठिकाने पे आए
उन्हें क्या कहें जिन के सर हो बुलंदी
उन्हें अक़्ल बस मात खाने पे आए
पता जब चला बाप की अहमियत का
जब उन की तरह हम कमाने पे आए
9
3 Likes
डरा सकता नहीं तूफ़ाँ हमें कोई
के देखे हैं कई सैलाब आँखों से
ख़िज़ाँ ने जो उजाड़ा है चमन मेरा
ख़ुदा कर दे उसे शादाब आँखों से
रुके अश्कों का इक तालाब है मुझ में
निकल जाए वही तालाब आँखों से
बताते हैं यही ता'रीफ़ में उस की
हमारा यार है नायाब आँखों से
तेरे हाथों पिए पानी से भी साक़ी
नज़र आए कई महताब आँखों से
8
2 Likes
बारिश में अक्सर नाव काग़ज़ की बनाते थे मियाँ
इन मौसमों का लुत्फ़ पहले यूँॅं उठाते थे मियाँ
इन मौसमों का लुत्फ़ पहले यूँॅं उठाते थे मियाँ
अब खिड़कियों से धूप आती है तो आँखें खुलती हैं
पहले उजाले से भी जल्दी जाग जाते थे मियाँ
है मुँह-ज़बानी याद गुज़रे दौर के क़िस्से हमें
कैसे कमाते थे कि कैसे घर चलाते थे मियाँ
7
3 Likes
MAHESH CHAUHAN NARNAULI
6
4 Likes
5
17 Likes
4
15 Likes
MAHESH CHAUHAN NARNAULI
3
14 Likes
आईना हमें ख़ुद का जब चेहरा दिखाता है
हर बार हमें ख़ुद की नज़रों में गिराता है
हर बार हमें ख़ुद की नज़रों में गिराता है
मुँह फेर के निकले थे क्या सोच के जाएँ अब
किस मुँह से कहे आख़िर, घर याद वो आता है
हम छोड़ वतन अपना परदेस में बैठे हैं
हर रोज़ वतन हम को आवाज़ लगाता है
ख़ामोश ज़बाँ मेरी तब शोर मचाती है
जब दोस्त नज़र कोई इस शहर में आता है
दिल भूल जा वो बातें, बातें जो पुरानी हैं
क्यूँ अश्क-ए-नदामत से आँखों को भिगाता है
2
16 Likes
"मज़हबी जंग"
उधर मज़हबी जंग का शोर है
ख़ुदा मेरा घर भी उसी ओर है
तबाही का मंज़र है जाएँ जिधर
है टूटी इमारत दुकानें सभी
है पत्थर ही पत्थर फ़क़त राह पर
कहीं चीख़ ने की सदा है
कहीं ख़ामुशी का है आलम
कहीं खूँ से लथपथ पड़ा है कोई
हैं तलवार हाथों में पकड़े कई
सितमगर बढ़ाते बग़ावत
न दैर-ओ-हरम है सलामत
ज़मीं पर है उतरी क़यामत
है बिगड़े से हालात अब शहर में
हुई हैं मियाँ
कई ज़िंदगी ख़त्म इस बैर में
फ़ज़ा में मिली है हवा ख़ौफ़ की
समुंदर लबा-लब है लाशों से ही
न महफ़ूज़ कोई यहाँ ठौर है
ये उठता धुआँ और जलता मकाँ
बताते हैं नफ़रत का ये दौर है
Read Fullख़ुदा मेरा घर भी उसी ओर है
तबाही का मंज़र है जाएँ जिधर
है टूटी इमारत दुकानें सभी
है पत्थर ही पत्थर फ़क़त राह पर
कहीं चीख़ ने की सदा है
कहीं ख़ामुशी का है आलम
कहीं खूँ से लथपथ पड़ा है कोई
हैं तलवार हाथों में पकड़े कई
सितमगर बढ़ाते बग़ावत
न दैर-ओ-हरम है सलामत
ज़मीं पर है उतरी क़यामत
है बिगड़े से हालात अब शहर में
हुई हैं मियाँ
कई ज़िंदगी ख़त्म इस बैर में
फ़ज़ा में मिली है हवा ख़ौफ़ की
समुंदर लबा-लब है लाशों से ही
न महफ़ूज़ कोई यहाँ ठौर है
ये उठता धुआँ और जलता मकाँ
बताते हैं नफ़रत का ये दौर है
1
16 Likes










