ज़रा खुल के जो मुस्कुराने पे आए
ज़माने के हम फिर निशाने पे आए
शहंशाह हो या कोई आम बंदा
जो चाहे मेरे आस्ताने पे आए
कहाँ ढूँढ़ते रहनुमा शहर में तुम
सो हम ख़ुद तुम्हारे ठिकाने पे आए
उन्हें क्या कहें जिन के सर हो बुलंदी
उन्हें अक़्ल बस मात खाने पे आए
पता जब चला बाप की अहमियत का
जब उन की तरह हम कमाने पे आए
— MAHESH CHAUHAN NARNAULI















