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काश तू इस से पहले मर जाता 'यासिर'
उस की मेहंदी पे नाम है और किसी का
उस की मेहंदी पे नाम है और किसी का
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Ammar 'yasir'
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मैं ने माना वो मेरा कुछ भी नहीं
हाँ मगर इस में बुरा कुछ भी नहीं
हाँ मगर इस में बुरा कुछ भी नहीं
मेरे आगे से वो कुछ ऐसे गया
मैं तो जैसे उस का था कुछ भी नहीं
उस पे सब अपना लुटा कर और फिर
मुझ को बदले में मिला कुछ भी नहीं
रात भर को जागने के बा'द मैं
यूँ उठा जैसे हुआ कुछ भी नहीं
देख मुझ को तेरे आगे बैठा हूँ
तुझ से जानाँ अब छुपा कुछ भी नहीं
जिस को चाहूँ छोड़ जाता है मुझे
इस में अब 'यासिर' नया कुछ भी नहीं
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तू नए किसी दर क्यूँ नहीं जाता
तेरा ख़्वाब बिखर क्यूँ नहीं जाता
तेरा ख़्वाब बिखर क्यूँ नहीं जाता
इतना प्यार में शर्मिंदा हुआ है
अब तू शर्म से मर क्यूँ नहीं जाता
उस की याद में क्यूँ ऐसे रहूँ मैं
ज़ख़्म उस का ये भर क्यूँ नहीं जाता
बार बार वो इक ही गली जाना
तू अभी भी सुधर क्यूँ नहीं जाता
कैसे उस की किसी याद से निकलूँ
उस का मुझ से असर क्यूँ नहीं जाता
कैसी इक बुरी नागिन थी वो हाए
ज़हर उस का उतर क्यूँ नहीं जाता
ईद को अभी यासिर है समय कुछ
छत से चाँद मगर क्यूँ नहीं जाता
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अब नहीं है याद उस को नाम हमारा
करता था दिल से जो एहतिराम हमारा
करता था दिल से जो एहतिराम हमारा
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उस की आँखों में पिघल जाते हैं
हर शब आवारा निकल जाते हैं
हर शब आवारा निकल जाते हैं
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