मैं प्यार हूँ न तेरा चलो दूसरा सही
दे मुझ को तू वफ़ा तेरी तू बे वफ़ा सही
तेरा ये लहजा मुझ को हमेशा रुलाता है
तू एक बार मुझ को गले तो लगा सही
शायद मैं उस के जैसा कभी भी न बन सकूँ
लेकिन हाँ उस के ज़ख़्म की कोई दवा सही
मेरा घमंड था ये कि तुझ को न मानना
अब ये कोई सज़ा है तेरी तो सज़ा सही
हर एक लफ़्ज़ तेरे लिए होता है मेरा
अब ये कोई दुआ है तेरी तो दुआ सही
— Ammar 'yasir'















