मैं ने माना वो मेरा कुछ भी नहीं

हाँ मगर इस में बुरा कुछ भी नहीं

मेरे आगे से वो कुछ ऐसे गया
मैं तो जैसे उस का था कुछ भी नहीं

उस पे सब अपना लुटा कर और फिर
मुझ को बदले में मिला कुछ भी नहीं

रात भर को जागने के बा'द मैं
यूँ उठा जैसे हुआ कुछ भी नहीं

देख मुझ को तेरे आगे बैठा हूँ
तुझ से जानाँ अब छुपा कुछ भी नहीं

जिस को चाहूँ छोड़ जाता है मुझे
इस में अब 'यासिर' नया कुछ भी नहीं

— Ammar 'yasir'

More by Ammar 'yasir'

Other ghazal from the same pen

See all from Ammar 'yasir' →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling