उस को देखा तो मैं ने नज़रें झुका दी
मैं ने इस दिल को अब ये कैसी सज़ा दी
उस से मिलना तो चाहता था मैं लेकिन
मिल के उस ने उम्मीद ये भी बुझा दी
इस वफ़ा के बदले वफ़ा चाहिए थी
उस ने लेकिन ये मुझ को कैसी वफ़ा दी
उस के जाने के बा'द फिर कोई न आए
मैं ने ख़ुद को मरहूम फिर ये दुआ दी
सो नहीं पाता हूँ मैं अब रात भर को
आग उस ने सीने मैं ऐसी लगा दी
— Ammar 'yasir'















