तेरी मुझ पर पड़ी नज़र जब से
मुझ को कुछ भी ख़बर नहीं तब से
मैं यहाँ लड़ रहा था ख़ुद ही से
मैं हुआ कैसे तेरा और कब से
खोया मैं एक ख़्वाब में कुछ यूँ
फिर न सोया मैं कुछ गई शब से
माँ की इज़्ज़त ये हुक्म है हम को
हम ने सीखा ये एक मकतब से
ये उसे देख के पता चला है
वो नहीं है किसी भी मज़हब से
— Ammar 'yasir'















