ख़ालीपन में काम हमारा फ़िक्र तुम्हारी ज़िक्र तुम्हारा
    गुज़रा वक़्त इसी में सारा फ़िक्र तुम्हारी ज़िक्र तुम्हारा

    ग़ालिब ने क्या ख़ूब कहा था इश्क़ निकम्मा कर डालेगा
    इस धंधे में सिर्फ़ ख़सारा फ़िक्र तुम्हारी ज़िक्र तुम्हारा
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    Saurabh Mehta 'Alfaaz'
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    ग़ज़ल को कुछ नए चेहरे नए अशआ'र देता हूँ
    मैं यूँ अल्फ़ाज़ के ख़ंजर को अपने धार देता हूँ

    कभी जब तैश में चाहूँ किसी का क़त्ल करना मैं
    तो फिर ग़ुस्से में आकर शे'र कोई मार देता हूँ
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    Saurabh Mehta 'Alfaaz'
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    सयाने आदमी हो, इश्क़ के चक्कर में मत पड़ना
    तुम्हें बर्बाद कर देगा, तुम्हें अच्छा बना देगा

    ख़ुदा चालाक है वो तिश्नगी तो क्या बुझाएगा
    बना देगा समंदर, और उसे खारा बना देगा
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    Saurabh Mehta 'Alfaaz'
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    करवट-करवट घूँट-घूँट भर, स्याह रात गुज़री ऐसे
    नींद किसी ने तह करके, अलमारी में रख दी जैसे
    Saurabh Mehta 'Alfaaz'
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    कुछ बातें ख़ुद तक ही रखना, बातों के पर होते हैं
    शहर में पक्के कान लिए, सब दीवार-ओ-दर होते हैं

    कुछ लोगों को हमने परखा, कुछ ने हमें हिदायत दी
    यक़ीं रखो, तो ख़ुद पर रखना, झूठे रहबर होते हैं

    ग़लती करके पछताना , तो इंसानों की फ़ितरत है
    और इल्ज़ाम ज़माने भर के, ख़ुदा के सर पर होते हैं

    इक झूठी उम्मीद से बेहतर सच्ची ना-उम्मीदी है
    ख़ैर, गुलिस्ताँ आख़िर में सब, बंजर-बंजर होते हैं

    उनसे कहना, ख़्वाब ज़रा सिरहाने रख कर सो जाएँ
    जागी आँखों में फिर काले घेरे अक्सर होते हैं

    क्यूँ कोई 'अल्फ़ाज़' किसी को नज़र करे अशआर कभी
    बे-ख़तरी हो तब भी दिल के अपने ही डर होते हैं
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    Saurabh Mehta 'Alfaaz'
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    रूठने वाले को इक हद तक मनाना चाहिए
    ज़िन्दगी जब कुछ सिखाए सीख जाना चाहिए

    रोज़ खोने का है डर, तो डर ख़तम कर दीजिए
    एक ही बारी में खोकर भूल जाना चाहिए

    एक अर्से से नहीं सोये थे उनकी याद में
    कमबख़त इस ख़्वाब को भी नींद आना चाहिए

    ग़ौर से देखो कि ये दुनिया बड़ी दिलचस्प है
    हर तमाशाबीन को कोई ठिकाना चाहिए

    आज दिल मायूस है ना जाने अब किस बात पे
    हर दफ़ा इसको नया कोई बहाना चाहिए

    उफ़, मिरी ये शक्ल पहचानी सी दिखती है मुझे
    याद आया, मुझको अक्सर मुस्कुराना चाहिए

    कैफ़ियत दिल की बयाँ 'अल्फाज़' कैसे हम करें
    दो घड़ी की उम्र है और इक ज़माना चाहिए
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    Saurabh Mehta 'Alfaaz'
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    तल्ख़ फब्तियाँ तीखी बातें उस पर तंज़ भरे अशआर
    उनके लब हरकत में आए शहद घुल गया कानों में
    Saurabh Mehta 'Alfaaz'
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    सुबह-सुबह ये आफ़ताब कौन लाया है
    बड़ी मशक़्क़तों से चाँद को सुलाया है

    धुआँ सा उठ रहा है कब से मेरी आँखों में
    बुझा दे जिस किसी ने दिल मेरा जलाया है
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    Saurabh Mehta 'Alfaaz'
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    नए मौसम में फिर तुम हम मिलेंगे देखना
    तुम्हारे ग़म से अपने ग़म मिलेंगे देखना

    किसी ने कह दिया कमतर अरे छोड़ो मियाँ
    जहाँ ढूंढोगे ख़ुद से कम मिलेंगे देखना

    कभी गर एक जुगनू ने दिखाया हौसला
    कई महताब फिर मद्धम मिलेंगे देखना

    इधर शिकवे रखे हैं और उधर रुस्वाइयाँ
    जिधर देखो यही आलम मिलेंगे देखना

    ख़ुदाया है कहाँ तू इस तरफ़ भी देख ले
    वगरना हर तरफ़ मातम मिलेंगे देखना

    वो जिसकी पीठ पर ख़ंजर के ज़्यादा घाव हैं
    उसी के पास हाँ मरहम मिलेंगे देखना

    संभलना के लबों को छू न पाएँ उँगलियाँ
    दहकती आग से रेशम मिलेंगे देखना

    बयाँ 'अल्फ़ाज़' अपनी तिश्नगी जो कर गए
    ये सूखे अब्र फिर पुर-नम मिलेंगे देखना
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    Saurabh Mehta 'Alfaaz'
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    पुराने ग़म भुलाने में ज़ियादा कुछ नहीं लगता
    कोई पूछे तो कहना वो हमारा कुछ नहीं लगता

    नयी रुस्वाइयाँ हर बार मुझसे मिलने आती हैं
    मुझे उसकी मोहब्बत में पुराना कुछ नहीं लगता

    नज़रअंदाज़ कर-कर के तुम अपना क़द बढ़ाते हो
    हमारी जान जाती है तुम्हारा कुछ नहीं लगता

    ज़रा इक हाथ बढ़ जाए तो शायद थाम भी लें हम
    हमारा ख़ुद से होकर तो इरादा कुछ नहीं लगता

    ये कैसा नूर है उनमें के बस देखे ही जाते हैं
    अब इन आँखों को ये शोला शरारा कुछ नहीं लगता

    तुम्हें समझा रहा हूँ फिर के सौदा फ़ायदे का है
    किसी के दिल में घर करके किराया कुछ नहीं लगता

    कभी 'अल्फ़ाज़' टूटें तो बिखर जाते हैं मिसरों पर
    ग़ज़लगोई में वैसे तो हमारा कुछ नहीं लगता
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    Saurabh Mehta 'Alfaaz'
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