
ग़ज़ल को कुछ नए चेहरे नए अश'आर देता हूँ
मैं यूँ अल्फ़ाज़ के ख़ंजर को अपने धार देता हूँ
कभी जब तैश में चाहूँ किसी का क़त्ल करना मैं
तो फिर ग़ुस्से में आ कर शे'र कोई मार देता हूँ
— Saurabh Mehta 'Alfaaz'
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