Saurabh Mehta 'Alfaaz'

Saurabh Mehta 'Alfaaz'

@Thesaurabhmehta

Saurabh Mehta 'Alfaaz' shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Saurabh Mehta 'Alfaaz''s shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

उन्हें खो कर ये माना हम सिफ़र हैं मुयस्सर पर उन्हें भी हम कहाँ हैं — Saurabh Mehta 'Alfaaz'
यार सारे, सारे आशिक़ और पुराने मुँह लगे अब ये कहते फिर रहे हैं कौन उस के मुँह लगे — Saurabh Mehta 'Alfaaz'
इतनी मुश्किल दुनियादारी, और फिर उस पर तेरे ग़म सारी दुनिया छोड़ के आए, मेरे ही सर तेरे ग़म — Saurabh Mehta 'Alfaaz'
ये मर्ज़ी ख़ुद उसी की है, मुझे क्या वो जिधर जाए गुज़ारे ज़िन्दगी, गुज़रे यहाँ से, या गुज़र जाए — Saurabh Mehta 'Alfaaz'
करवट-करवट घूँट-घूँट भर, स्याह रात गुज़री ऐसे नींद किसी ने तह कर के, अलमारी में रख दी जैसे — Saurabh Mehta 'Alfaaz'
दर्द की कैफ़ियत कैसे कह दें? बूझो रुख़्सार पे झिलमिल क्या है — Saurabh Mehta 'Alfaaz'
बड़ा ही ख़ुश्क है ये हिज्र-ए-आलम, ज़ख़ीरे दोनों अब कम पड़ रहे हैं यूँँ मुरझाने लगे ख़्वाबों के जंगल, मिरी आँखों से पत्ते झड़ रहे हैं — Saurabh Mehta 'Alfaaz'
दहर भर-भर शिकायत के पुलिन्दे हैं ज़ेहन में लबों पर फिर भी शिकवों का कोई पुर्ज़ा नहीं है — Saurabh Mehta 'Alfaaz'
शिकवे हैं शाने हैं अश्क-ओ-गिर्या है तुम ना हो तो फिर तो सारी दुनिया है — Saurabh Mehta 'Alfaaz'
निकलते हैं कफ़न बांधे फ़ना होने की निय्यत से के संग एक ही उछालेंगे मगर अब के तबीअत से — Saurabh Mehta 'Alfaaz'
दोनों हैं ख़ामोश, के शायद, दोनों जानिब इकतरफ़ा है छोड़ो अपने हाल पे इनको, समझो साहिब! इकतरफ़ा है — Saurabh Mehta 'Alfaaz'
कोई मसरूफ़ियत होगी तुम्हारी हमें तो तुम सेे ही फ़ुर्सत नहीं है — Saurabh Mehta 'Alfaaz'
आज दिल मायूस है ना जाने अब किस बात पे हर दफ़ा इस को नया कोई बहाना चाहिए — Saurabh Mehta 'Alfaaz'
तल्ख़ फब्तियाँ तीखी बातें उस पर तंज़ भरे अश'आर उन के लब हरकत में आए शहद घुल गया कानों में — Saurabh Mehta 'Alfaaz'
परेशाँ से जो आँसू, शब, सिरहाने रख दिए थे सवेरे फिर बिखर कर, आँख में चुभने लगे हैं — Saurabh Mehta 'Alfaaz'

Ghazal

वो बढ़ते फ़ासले पैहम हमारी जान ले बैठे मुसलसल इश्क़ के मातम हमारी जान ले बैठे उधर थीं बारिशें शायद इनायत और उल्फ़त की यहाँ तो हिज्र के मौसम हमारी जान ले बैठे किसी टूटे हुए दिल को कहो कैसे करार आए कहीं ऐसा न हो मरहम हमारी जान ले बैठे बस उन की उँगलियों पर हम ने अपनी ज़िन्दगी रख दी हुआ बस इक इशारा हम हमारी जान ले बैठे शजर सारे ख़फ़ा थे जब चिता में ख़ाक होते थे कि अपने संग ये आदम हमारी जान ले बैठे हमीं उल्फ़त के इस दंगल में जो कूदे बिना सोचे करेंगे क्या अगर रुस्तम हमारी जान ले बैठे बदल देते हैं सब 'अल्फ़ाज़' सारे सुर ग़ज़ल के हम कि इस सेे पहले ये सरगम हमारी जान ले बैठे — Saurabh Mehta 'Alfaaz'
ये मर्ज़ी ख़ुद उसी की है, मुझे क्या वो जिधर जाए गुज़ारे ज़िन्दगी, गुज़रे यहाँ से, या गुज़र जाए अगरचे लौटने पर लोग भूला ना कहें फिर भी अभी वो सोचता है शाम क्या मुँह ले के घर जाए अरे छोड़ो कि ख़ंजर कौन लाया किस ने घोंपा था अभी तरजीह ये है किस तरह ये घाव भर जाए यूँँ अक्सर बे-सबब उम्मीद देना छोड़ दो उस को कहीं ऐसा न हो मारे ख़ुशी बे-मौत मर जाए तुम्हारे मशवरे और इल्म अपने पास ही रक्खो वगरना ये बुरी आदत तुम्हें ही ना अखर जाए मैं चारा-गर नहीं लेकिन मरज़ पहचानता हूँ मैं दवा देकर भी ये मुमकिन नहीं हालत सुधर जाए हमारी मौत मांगें वो, हम अपनी उम्र उन को दें दुआ है कौन सी देखो जो अपना काम कर जाए लिखें कुछ तंज़िया 'अल्फ़ाज़' जिन पर दाद मिलती हो सलामत जिन से लाठी भी रहे और साँप मर जाए — Saurabh Mehta 'Alfaaz'
बस इक पल में मुझे तुम सा तुम्हें मुझ सा बना देगा अभी देखो ये पहिया वक़्त का क्या क्या बना देगा सियाने आदमी हो, इश्क़ के चक्कर में मत पड़ना तुम्हें बर्बाद कर देगा, तुम्हें अच्छा बना देगा ख़ुदा चालाक है वो तिश्नगी तो क्या बुझाएगा बना देगा समुंदर और उसे खारा बना देगा बड़ी मुद्दत से ख़्वाहिश है उसे इक रोज़ मिलने की मिलेगा एक लम्हे को मुझे ज़िंदा बना देगा भले ही हौसला हर इक दफ़ा वो तोड़ दें मेरा यक़ीं मेरा उसे हर बार दोबारा बना देगा विसाल-ए-यार को 'अल्फ़ाज़' में लिख पाओगे कैसे वो इक एहसास हर इक लफ़्ज़ को बौना बना देगा — Saurabh Mehta 'Alfaaz'
कुछ बातें ख़ुद तक ही रखना, बातों के पर होते हैं शहर में पक्के कान लिए, सब दीवार-ओ-दर होते हैं कुछ लोगों को हम ने परखा, कुछ ने हमें हिदायत दी यक़ीं रखो, तो ख़ुद पर रखना, झूठे रहबर होते हैं ग़लती कर के पछताना , तो इंसानों की फ़ितरत है और इल्ज़ाम ज़माने भर के, ख़ुदा के सर पर होते हैं इक झूठी उम्मीद से बेहतर सच्ची ना-उम्मीदी है ख़ैर, गुलिस्ताँ आख़िर में सब, बंजर-बंजर होते हैं उन सेे कहना, ख़्वाब ज़रा सिरहाने रख कर सो जाएँ जागी आँखों में फिर काले घेरे अक्सर होते हैं क्यूँँ कोई 'अल्फ़ाज़' किसी को नज़र करे अश'आर कभी बे-ख़तरी हो तब भी दिल के अपने ही डर होते हैं — Saurabh Mehta 'Alfaaz'
रूठने वाले को इक हद तक मनाना चाहिए ज़िन्दगी जब कुछ सिखाए सीख जाना चाहिए रोज़ खोने का है डर, तो डर ख़तम कर दीजिए एक ही बारी में खो कर भूल जाना चाहिए एक अर्से से नहीं सोए थे उन की याद में कमबख़त इस ख़्वाब को भी नींद आना चाहिए ग़ौर से देखो कि ये दुनिया बड़ी दिलचस्प है हर तमाशाबीन को कोई ठिकाना चाहिए आज दिल मायूस है ना जाने अब किस बात पे हर दफ़ा इस को नया कोई बहाना चाहिए उफ़, मिरी ये शक्ल पहचानी सी दिखती है मुझे याद आया, मुझ को अक्सर मुस्कुराना चाहिए कैफ़ियत दिल की बयाँ 'अल्फाज़' कैसे हम करें दो घड़ी की उम्र है और इक ज़माना चाहिए — Saurabh Mehta 'Alfaaz'
पुरानी बात पर आख़िर, परेशाँ क्यूँँ हुआ जाए भरे ज़ख़्मों को रह-रह कर भला क्यूँँ कर छुआ जाए मोहब्बत - आज़माई भी मोहब्बत में रिवायत है मुहासिल है शिकस्त-ए-दिल, किसी जानिब जुआ जाए इबादत जब कोई मुमकिन हो, इतना कमसकम कीजे क़यामत तक के सजदे हों, फ़लक तक ये दुआ जाए परेशाँ हूँ मैं दिल की साफ़गोई और सदाक़त से ज़माना झूठ का, सम्त-ए-मुख़ालिफ़ ये मुआ जाए भले लोगों की दुनिया में भला होना तो अच्छा है मगर ये लाज़मी है के यहाँ बदतर हुआ जाए उधर स्याही लिए वो लफ़्ज़ सफ़हों पर गिराते हैं इधर 'अल्फ़ाज़' हैं, जिन से लहू भी गेरुआ जाए — Saurabh Mehta 'Alfaaz'
किसी ख़्वाहिश के मर जाने का मतलब जानते हो? बड़े बनते हो आलिम यूँँ, के तुम सब जानते हो रिवायत अहल-ए-दुनिया की, हमें सिखला रहे हो? हमें मालूम है कब से, जो तुम अब जानते हो करे बुत की इबादत, बे-रहम पे रक्खे ईमाँ सुनो, ऐसे किसी काफ़िर का मज़हब जानते हो? शरारा छोड़ कर तो चल दिए थे बे-रुख़ी से जो शब भर फिर धुआँ उट्ठा, जली शब, जानते हो? तुम्हें थी नागवारा दिल-लगी भी, बे-दिली भी तो कैसे ख़ुद भी तुम सारे ये करतब जानते हो? अगर ख़ामोश हैं 'अल्फ़ाज़' तो फ़ितरत है उन की तुम्हीं अब इब्तिदा कर दो तुम्हीं जब जानते हो — Saurabh Mehta 'Alfaaz'
ताज़ा ताज़ा दानाई है और पुराना पागलपन है हाँ उल्फ़त का क़तरा-क़तरा दाना-दाना पागलपन है मेरी नज़रों से देखो तो सारी दुनिया दीवानी है तेरी आँखों में भी कैसा यार सुहाना पागलपन है दोज़ख़ या जन्नत में रक्खे ये उस की अपनी मर्ज़ी है पर इंसानी दुनिया में तो आना जाना पागलपन है अब तक चलना इक दूजे संग शायद अपना पागलपन था जैसे राहों का मंज़िल तक साथ निभाना पागलपन है ये अश्कों की जुरअत है जो तुम सेे शिकवे कर बैठे हैं वर्ना सहरा को दरिया के ख़्वाब दिखाना पागलपन है दुश्वारी है बे-ताबी है बे-तरतीबी बे-ज़ारी है देखो तो सब कुछ है इस में एक ख़ज़ाना पागलपन है — Saurabh Mehta 'Alfaaz'
इतनी मुश्किल दुनियादारी, और फिर उस पर तेरे ग़म सारी दुनिया छोड़ के आए, मेरे ही सर तेरे ग़म वो तो हम ने गिर्या कर के बहला रक्खा है उन को वरना कब के ही चल देते आपा खो कर तेरे ग़म बंद रखे दरवाज़े दिल के और ज़ेहन पे ताले थे जाने फिर कैसे घुस आए मेरे अंदर तेरे ग़म एक तरफ़ ख़ुश्की है कितनी, एक तरफ़ कितनी फिसलन तेरी बातें अब्र-ए-बाराँ, बंजर बंजर तेरे ग़म काफ़ी थे बस ढाई आखर हर गुत्थी सुलझाने को पर अपने हिस्से में आए दो ही अक्षर तेरे 'ग़म' लिख कर कुछ 'अल्फ़ाज़' तुझी पर हम कातिब हो जाते पर उन सफ़हों के संग जलाए हम ने लिखकर तेरे ग़म — Saurabh Mehta 'Alfaaz'
ज़रा आराम से, उजलत नहीं है अमाँ ये हिज्र है, क़ुर्बत नहीं है कोई मसरूफ़ियत होगी तुम्हारी हमें तो तुम सेे ही फ़ुर्सत नहीं है सहरस साँझ बस तेरा तसव्वुर सिवा इस के कोई भी लत नहीं है सुख़नवर कर रहा ईज़ा-फ़रोशी अब उस के घर में भी ग़ुरबत नहीं है कि वाइज़ को सिखा दो मय-कशी ही इन्हीं को मज़हबी दहशत नहीं है तुम्हारे पास मौक़ा' था, कहाँ थे? हमारे पास अब मोहलत नहीं है ये दिल ऐसा फ़क़ीराना हुआ है कि अब तो इश्क़ भी हसरत नहीं है बिखर कर मर गया आँखों में शायद सुब्ह से ख़्वाब में हरकत नहीं है हमें सिखलाओगे तुम इल्म-ए-उल्फ़त? तुम्हारे पास वो शिद्दत नहीं है हुए 'अल्फ़ाज़’ यूँँ सिक्कों में खोटे खनक तो है मगर क़ीमत नहीं है — Saurabh Mehta 'Alfaaz'
उल्फ़त से परेशान सिर्फ़ मैं ही नहीं था वो भी था मेहरबान सिर्फ़ मैं ही नहीं था ज़िद कर के आफ़ताब को खीसे में रख लिया रौशन था ये जहान, सिर्फ़ मैं ही नहीं था हर चाल पे उस की फ़ना हुआ कोई मोहरा इतना था इत्मीनान सिर्फ़ मैं ही नहीं था करता रहा वो क़त्ल-ए-अना जम के बारहा मयख़ाने में नादान सिर्फ़ मैं ही नहीं था उस सेे भी पहले था ख़ुदा या कोई नहीं था इस बात से हैरान सिर्फ़ मैं ही नहीं था यूँँ फ़ासले बढ़ते ही रहे वक़्त गुज़रते हालाँकि बदगुमान सिर्फ़ मैं ही नहीं था हर बार ही चुप हो रहे थे हम में वो 'अल्फ़ाज़' रिश्तों के दरमियान सिर्फ़ मैं ही नहीं था — Saurabh Mehta 'Alfaaz'
नए मौसम में फिर तुम हम मिलेंगे देखना तुम्हारे ग़म से अपने ग़म मिलेंगे देखना किसी ने कह दिया कमतर अरे छोड़ो मियाँ जहाँ ढूँडोगे ख़ुद से कम मिलेंगे देखना कभी गर एक जुगनू ने दिखाया हौसला कई महताब फिर मद्धम मिलेंगे देखना इधर शिकवे रखे हैं और उधर रुस्वाइयाँ जिधर देखो यही आलम मिलेंगे देखना ख़ुदाया है कहाँ तू इस तरफ़ भी देख ले वगरना हर तरफ़ मातम मिलेंगे देखना वो जिस की पीठ पर ख़ंजर के ज़्यादा घाव हैं उसी के पास हाँ मरहम मिलेंगे देखना संभलना के लबों को छू न पाएँ उँगलियाँ दहकती आग से रेशम मिलेंगे देखना बयाँ 'अल्फ़ाज़' अपनी तिश्नगी जो कर गए ये सूखे अब्र फिर पुर-नम मिलेंगे देखना — Saurabh Mehta 'Alfaaz'
पुराने ग़म भुलाने में ज़ियादा कुछ नहीं लगता कोई पूछे तो कहना वो हमारा कुछ नहीं लगता नई रुस्वाइयाँ हर बार मुझ सेे मिलने आती हैं मुझे उस की मोहब्बत में पुराना कुछ नहीं लगता नज़रअंदाज़ कर-कर के तुम अपना क़द बढ़ाते हो हमारी जान जाती है तुम्हारा कुछ नहीं लगता ज़रा इक हाथ बढ़ जाए तो शायद थाम भी लें हम हमारा ख़ुद से होकर तो इरादा कुछ नहीं लगता ये कैसा नूर है उन में के बस देखे ही जाते हैं अब इन आँखों को ये शो'ला शरारा कुछ नहीं लगता तुम्हें समझा रहा हूँ फिर के सौदा फ़ायदे का है किसी के दिल में घर कर के किराया कुछ नहीं लगता कभी 'अल्फ़ाज़' टूटें तो बिखर जाते हैं मिसरों पर ग़ज़लगोई में वैसे तो हमारा कुछ नहीं लगता — Saurabh Mehta 'Alfaaz'

Nazm

"चलो बचपन उगाते हैं" चलो भली आदत बनाते हैं चलो ख़ुद को सिखाते हैं चलो बचपन उगाते हैं तजुर्बे ज़र्द से लगने लगे हैं कवर उन पर चढ़ाते हैं... चलो बचपन उगाते हैं... चलो सींचें वो बीता कल जुगत से चलो खेलें वही सब खेल कल के चलो उन गर्मियों की कुल्फ़ियों को फिर मनाते हैं चलो बचपन उगाते हैं के चुटकी एक ले कर मुस्कुराहट की मिलाते हैं समय की आँच पर यादों की हांडी फिर चढ़ाते हैं मिलाते हैं वो इक छोटा सा चम्मच बचपने का चलो मिल कर के फिर से वो ही नादानी पकाते हैं सुनहरा एक और सिक्का सुब्ह की धूप का चलका चलो शीशे के टुकड़े से, उसे घर भर घुमाते हैं या वो छोटा सा साबुन का गुबारा फूँक से हल्का अंगूठे और उँगली को मिलाकर फिर फुलाते हैं या डब्बे से चुरा कर गुड़ के लड्डू जेब में रख कर यारों को दिखा कर खाके सब को फिर जलाते हैं चलो बचपन उगाते हैं किसी के दस के गिनते ही..कहीं कोने में छुप कर के कभी चुपके से उस की पीठ पर धप्पा जमाते हैं चलो बचपन उगाते हैं — Saurabh Mehta 'Alfaaz'
"कब तक ख़ैर मनाते हम" उल्फ़त के कूचों से साबित कैसे बचकर आते हम हम ठहरे बकरे की अम्मा, कब तक ख़ैर मनाते हम बड़ी बड़ी बातें कर दी थीं उन पर जान लुटाएंगे हुक़्म करें वो, आसमान से तारे भी ले आएँगे पर क़िस्मत और क़ुदरत इक थाली के चट्टे बट्टे थे कोशिश अपनी पूरी रहती पर अंगूर तो खट्टे थे बिगड़ा स्वाद जो उन के मुँह का उन को चटनी खानी थी बेचारा दिल, बेवकूफ़ था कुछ अपनी नादानी थी अदने से दिल की ख़ातिर क्या मूसल से डर जाते हम? हम ठहरे बकरे की अम्मा, कब तक ख़ैर मनाते हम हम ने पूरी जुगत लगाई मगर सफलता ना मिल पाई फिर हम ने उम्मीद छोड़ दी ख़ुद से छेड़ी एक लड़ाई अब बातों में ना आएँगे उन जैसे ही बन जाएँगे उन की जानिब ना देखेंगे नाम 'नयनसुख' कह लाएँगे लेकिन हम थे सावन वाले और ऊपर से दिल के छाले छोड़ रेवड़ी उन की ख़ातिर हम ने रूखी सूखी खाई ऊँट सो गया उलटी करवट जमके ली उस ने जम्हाई पड़ते ओलों में अब देखो अपना सर मुंडवाते हम हम ठहरे बकरे की अम्मा, कब तक ख़ैर मनाते हम इधर प्रिये मधु है, और हम हैं तुम उस पार नज़र आते हो कैसे बीन बजाएँ हिय की तुम तो ऐसे पगुराते हो कान पे जूँ रेंगाने ख़ातिर हम प्रयत्न करते रहते हैं तिस पर तुम क्रोधित होते हो हम तुम सेे डरते रहते हैं ख़ैर, हुआ सो बिसरा देते तुम थोड़ा सा इतरा लेते हम थोड़ी मनुहार लगाकर कोप तुम्हारा छितरा देते किन्तु अतिप्रिय तुम्हें क्रोध था और ना इस का कोई बोध था हम सेे तुम कटते जाते थे यथा दुग्ध, फटते जाते थे इतने फटे हुए में कैसे अपनी टांग अड़ाते हम हम ठहरे बकरे की अम्मा, कब तक ख़ैर मनाते हम — Saurabh Mehta 'Alfaaz'
"एक बात'" क्या तुम्हें भी सिखा दूँ वो हुनर जिस सेे पढ़ लिया करता हूँ तुम्हारी आँखों को उन सब बातों को जो दबी रहती हैं तुम्हारी पलकों की क़तारों में तब भी, जब लब ख़ामोश होते हैं तुम्हारे या तब, जब बस यूँँ ही मुस्कुरा देती हो मुझ सेे बात करते-करते और तब, जब होंठ तुम्हारे कुछ और ही कहते हैं और कहते कहते रुक जाया करते हैं एक बात नहीं बताई तुम्हें के तब मैं चुपके से पढ़ लिया करता हूँ तुम्हारी आँखों को पूछ लेता हूँ हाल तुम्हारा कहता कुछ नहीं हाँ, आँखें बात करती हैं मेरी भी हज़ारों सवालात भी तुम्हारी ही तरह फिर क्यूँँ जवाब नहीं दे पातीं तुम्हारी आँखें क्या तुम्हें भी सिखा दूँ वो हुनर जिस सेे पढ़ लिया करता हूँ तुम्हारी आँखों को कि तुम भी पढ़ लो वो बातें जिन में होंठ ख़ामोश रहते हैं और वो सारी बातें जो अब तक नहीं कही तुम सेे या मुझे भी सिखा दो अपना आँखों से झूठ बोलने का हुनर — Saurabh Mehta 'Alfaaz'