"कब तक ख़ैर मनाते हम"

उल्फ़त के कूचों से साबित कैसे बचकर आते हम
हम ठहरे बकरे की अम्मा, कब तक ख़ैर मनाते हम

बड़ी बड़ी बातें कर दी थीं
उन पर जान लुटाएंगे
हुक़्म करें वो, आसमान से
तारे भी ले आएँगे
पर क़िस्मत और क़ुदरत इक
थाली के चट्टे बट्टे थे
कोशिश अपनी पूरी रहती
पर अंगूर तो खट्टे थे
बिगड़ा स्वाद जो उन के मुँह का
उन को चटनी खानी थी
बेचारा दिल, बेवकूफ़ था
कुछ अपनी नादानी थी
अदने से दिल की ख़ातिर क्या मूसल से डर जाते हम?
हम ठहरे बकरे की अम्मा, कब तक ख़ैर मनाते हम

हम ने पूरी जुगत लगाई
मगर सफलता ना मिल पाई
फिर हम ने उम्मीद छोड़ दी
ख़ुदस छेड़ी एक लड़ाई
अब बातों में ना आएँगे
उन जैसे ही बन जाएँगे
उन की जानिब ना देखेंगे
नाम 'नयनसुख' कह
लाएँगे
लेकिन हम थे सावन वाले
और ऊपर से दिल के छाले
छोड़ रेवड़ी उन की ख़ातिर
हम ने रूखी सूखी खाई
ऊँट सो गया उलटी करवट
जमके ली उस ने जम्हाई
पड़ते ओलों में अब देखो अपना सर मुंडवाते हम
हम ठहरे बकरे की अम्मा, कब तक ख़ैर मनाते हम

इधर प्रिये मधु है, और हम हैं
तुम उस पार नज़र आते हो
कैसे बीन बजाएँ हिय की
तुम तो ऐसे पगुराते हो
कान पे जूँ रेंगाने ख़ातिर
हम प्रयत्न करते रहते हैं
तिस पर तुम क्रोधित होते हो
हम तुम से डरते रहते हैं
ख़ैर, हुआ सो बिसरा देते
तुम थोड़ा सा इतरा लेते
हम थोड़ी मनुहार लगाकर
कोप तुम्हारा छितरा देते
किन्तु अतिप्रिय तुम्हें क्रोध था
और ना इस का कोई बोध था
हम से तुम कटते जाते थे
यथा दुग्ध, फटते जाते थे
इतने फटे हुए में कैसे अपनी टांग अड़ाते हम
हम ठहरे बकरे की अम्मा, कब तक ख़ैर मनाते हम

— Saurabh Mehta 'Alfaaz'

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