zara aaraam se ujlat nahin hai | ज़रा आराम से, उजलत नहीं है

  - Saurabh Mehta 'Alfaaz'

ज़रा आराम से, उजलत नहीं है
अमाँ ये हिज्र है, क़ुर्बत नहीं है

कोई मसरूफ़ियत होगी तुम्हारी
हमें तो तुम सेे ही फ़ुर्सत नहीं है

सहरस साँझ बस तेरा तसव्वुर
सिवा इसके कोई भी लत नहीं है

सुख़नवर कर रहा ईज़ा-फ़रोशी
अब उसके घर में भी ग़ुरबत नहीं है

कि वाइज़ को सिखा दो मय-कशी ही
इन्हीं को मज़हबी दहशत नहीं है

तुम्हारे पास मौक़ा' था, कहाँ थे?
हमारे पास अब मोहलत नहीं है

ये दिल ऐसा फ़क़ीराना हुआ है
कि अब तो 'इश्क़ भी हसरत नहीं है

बिखर कर मर गया आँखों में शायद
सुब्ह से ख़्वाब में हरकत नहीं है

हमें सिखलाओगे तुम इल्म-ए-उल्फ़त?
तुम्हारे पास वो शिद्दत नहीं है

हुए 'अल्फ़ाज़’ यूँँ सिक्कों में खोटे
खनक तो है मगर क़ीमत नहीं है

  - Saurabh Mehta 'Alfaaz'

Ghar Shayari

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