नम दीवारों सा रहता है
मन हरदम उखड़ा रहता है
बा'द तेरे तेरी यादों का
मजमा एक लगा रहता है
तुम पागल हो मैं पागल हूँ
फिर दुनिया में क्या रहता है
शब भी कैसी शैदाई है
चाँद बड़ा तन्हा रहता है
नींद उड़ा ले जाते हैं ग़म
सारा शहर जगा रहता है
आँखों में फिसलन रहती है
अक्सर आब जमा रहता है
— Saurabh Mehta 'Alfaaz'















