ye marzi khud usii ki hai mujhe kya vo jidhar jaa.e | ये मर्ज़ी ख़ुद उसी की है, मुझे क्या वो जिधर जाए

  - Saurabh Mehta 'Alfaaz'

ये मर्ज़ी ख़ुद उसी की है, मुझे क्या वो जिधर जाए
गुज़ारे ज़िन्दगी, गुज़रे यहाँ से, या गुज़र जाए

अगरचे लौटने पर लोग भूला ना कहें फिर भी
अभी वो सोचता है शाम क्या मुँह लेके घर जाए

अरे छोड़ो कि ख़ंजर कौन लाया किसने घोंपा था
अभी तरजीह ये है किस तरह ये घाव भर जाए

यूँँ अक्सर बेसबब उम्मीद देना छोड़ दो उसको
कहीं ऐसा न हो मारे ख़ुशी बे-मौत मर जाए

तुम्हारे मशवरे और इल्म अपने पास ही रक्खो
वगरना ये बुरी आदत तुम्हें ही ना अखर जाए

मैं चारागर नहीं लेकिन मरज़ पहचानता हूँ मैं
दवा देकर भी ये मुमकिन नहीं हालत सुधर जाए

हमारी मौत मांगें वो, हम अपनी 'उम्र उनको दें
दुआ है कौन सी देखो जो अपना काम कर जाए

लिखें कुछ तंज़िया 'अल्फ़ाज़' जिन पर दाद मिलती हो
सलामत जिनसे लाठी भी रहे और साँप मर जाए

  - Saurabh Mehta 'Alfaaz'

Ghayal Shayari

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