"चलो बचपन उगाते हैं"

चलो
भली आदत बनाते हैं
चलो ख़ुद को सिखाते हैं
चलो बचपन उगाते हैं

तजुर्बे ज़र्द से लगने लगे हैं
कवर उन पर चढ़ाते हैं...
चलो बचपन उगाते हैं...

चलो सींचें वो बीता कल जुगत से
चलो खेलें वही सब खेल कल के
चलो उन गर्मियों की कुल्फ़ियों को फिर मनाते हैं
चलो बचपन उगाते हैं

के चुटकी एक ले कर मुस्कुराहट की मिलाते हैं
समय की आँच पर यादों की हांडी फिर चढ़ाते हैं
मिलाते हैं वो इक छोटा सा चम्मच बचपने का
चलो मिल कर के फिर से वो ही नादानी पकाते हैं

सुनहरा एक और सिक्का सुब्ह की धूप का चलका
चलो शीशे के टुकड़े से, उसे घर भर घुमाते हैं

या वो छोटा सा साबुन का गुबारा फूँक से हल्का
अंगूठे और उँगली को मिलाकर फिर फुलाते हैं

या डब्बे से चुरा कर गुड़ के लड्डू जेब में रख कर
यारों को दिखा कर खाके सब को फिर जलाते हैं
चलो बचपन उगाते हैं

किसी के दस के गिनते ही..कहीं कोने में छुप कर के
कभी चुपके से उस की पीठ पर धप्पा जमाते हैं

चलो बचपन उगाते हैं

— Saurabh Mehta 'Alfaaz'

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