किसी ख़्वाहिश के मर जाने का मतलब जानते हो?

बड़े बनते हो आलिम यूँ, के तुम सब जानते हो

रिवायत अहल-ए-दुनिया की, हमें सिखला रहे हो?
हमें मालूम है कब से, जो तुम अब जानते हो

करे बुत की इबादत, बे-रहम पे रक्खे ईमाँ
सुनो, ऐसे किसी काफ़िर का मज़हब जानते हो?

शरारा छोड़ कर तो चल दिए थे बे-रुख़ी से
जो शब भर फिर धुआँ उट्ठा, जली शब, जानते हो?

तुम्हें थी नागवारा दिल-लगी भी, बे-दिली भी
तो कैसे ख़ुद भी तुम सारे ये करतब जानते हो?

अगर ख़ामोश हैं 'अल्फ़ाज़' तो फ़ितरत है उन की
तुम्हीं अब इब्तिदा कर दो तुम्हीं जब जानते हो

— Saurabh Mehta 'Alfaaz'

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