"एक बात'"
क्या तुम्हें भी सिखा दूँ वो हुनर
जिस से पढ़ लिया करता हूँ
तुम्हारी आँखों को
उन सब बातों को
जो दबी रहती हैं
तुम्हारी पलकों की क़तारों में
तब भी, जब लब ख़ामोश होते हैं तुम्हारे
या तब, जब बस यूँ ही मुस्कुरा देती हो
मुझ से बात करते-करते
और तब, जब होंठ तुम्हारे कुछ और ही कहते हैं
और कहते कहते रुक जाया करते हैं
एक बात नहीं बताई तुम्हें
के तब मैं चुपके से
पढ़ लिया करता हूँ
तुम्हारी आँखों को
पूछ लेता हूँ हाल तुम्हारा
कहता कुछ नहीं
हाँ, आँखें बात करती हैं मेरी भी
हज़ारों सवालात भी
तुम्हारी ही तरह
फिर क्यूँ जवाब
नहीं दे पातीं तुम्हारी आँखें
क्या तुम्हें भी सिखा दूँ वो हुनर
जिस से पढ़ लिया करता हूँ
तुम्हारी आँखों को
कि तुम भी पढ़ लो
वो बातें
जिन
में होंठ ख़ामोश रहते हैं
और वो सारी बातें
जो अब तक नहीं कही तुम से
या मुझे भी सिखा दो अपना
आँखों से झूठ बोलने का हुनर















