रात

रात बड़ी ख़राब है
हर रात ख़राब कर देती है

रात भर जाग कर
हर सुब्ह, सुब्ह को दे देती है
कुछ ऊंघते हुए ख़्वाब
कुछ गुज़री रातों के क़िस्से
कुछ बुझी हुए यादों की ख़ाक
और सिरहाने पर
माज़ी के खारे धब्बे

रात बड़ी ख़राब है
दिन भर के मुरझाए ज़ख़्मों को
फिर हरा कर देती है और
महकने देती है रात भर
किसी रात रानी की तरह

मौका देती है कि सम्भल जाऊँ मैं
और फिर ले जाती है अपने साथ
पहले से ज़्यादा फिसलन वाली जगह पर

रात.. बड़ी ख़राब है
पर, एक रात ही तो है
जो साथ होती है रात भर
ख़ामोशी से सुनती है
मेरी हर ख़ामोशी को
समझती है
मेरी हर बात को
मेरी हर रात को
रात

— Saurabh Mehta 'Alfaaz'

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