"वजहें"
सुनो!
जाने से ऐतराज़ नहीं मुझे
पर जाओ,
तो लौट आने की वजहें छोड़ जाना
आज न सही
कल सुलझ जाएंगी
क्या सही है
इन्हें खींच कर तोड़ देना?
या बेहतर है
गिरहें रहने देना
और वक़्त पर छोड़ देना
अदद राब्तों में
लाज़िम हैं रुस्वाइयाँ भी
जब मनाये कोई
तो और रूठना
जिरह करना
फिर मान जाना
बात बिगड़ जाती है
चुप रहने से भी
सब चुप-चाप सहने से भी
कहना
कह देना
कहने देना
ख़ामोशियों के भरोसे मत रहना
अब जाओ
पर लौट आने की वजहें छोड़ जाना
— Saurabh Mehta 'Alfaaz'















