इन आँखों के ज़ख़ाइर नम कहाँ हैं
ज़माने भर में इतने ग़म कहाँ हैं
उन्हें खो कर ये माना हम सिफ़र हैं
मुयस्सर पर उन्हें भी हम कहाँ हैं
परेशाँ हैं हमारी उँगलियाँ भी
तुम्हारे गेसुओं के ख़म कहाँ हैं
मुसलसल ख़्वाब हैं बस ख़्वाब ही हैं
मगर नींदें यहाँ पैहम कहाँ हैं
बचे हैं राब्ते अब नाम ही को
अजी बस साथ हैं बाहम कहाँ हैं
जिधर देखो उधर नश्तर ही नश्तर
दुकानों में भी अब मरहम कहाँ हैं
यक़ीनन इश्क़-ओ-उल्फ़त पुर-सुकूँ हैं
पर इन
में भी मसाइल कम कहाँ हैं
— Saurabh Mehta 'Alfaaz'















