उल्फ़त से परेशान सिर्फ़ मैं ही नहीं था

वो भी था मेहरबान सिर्फ़ मैं ही नहीं था

ज़िद कर के आफ़ताब को खीसे में रख लिया
रौशन था ये जहान, सिर्फ़ मैं ही नहीं था

हर चाल पे उस की फ़ना हुआ कोई मोहरा
इतना था इत्मीनान सिर्फ़ मैं ही नहीं था

करता रहा वो क़त्ल-ए-अना जम के बारहा
मयख़ाने में नादान सिर्फ़ मैं ही नहीं था

उस से भी पहले था ख़ुदा या कोई नहीं था
इस बात से हैरान सिर्फ़ मैं ही नहीं था

यूँ फ़ासले बढ़ते ही रहे वक़्त गुज़रते
हालाँकि बदगुमान सिर्फ़ मैं ही नहीं था

हर बार ही चुप हो रहे थे हम में वो 'अल्फ़ाज़'
रिश्तों के दरमियान सिर्फ़ मैं ही नहीं था

— Saurabh Mehta 'Alfaaz'

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