इतनी मुश्किल दुनियादारी, और फिर उस पर तेरे ग़म

सारी दुनिया छोड़ के आए, मेरे ही सर तेरे ग़म

वो तो हम ने गिर्या कर के बहला रक्खा है उन को
वरना कब के ही चल देते आपा खो कर तेरे ग़म

बंद रखे दरवाज़े दिल के और ज़ेहन पे ताले थे
जाने फिर कैसे घुस आए मेरे अंदर तेरे ग़म

एक तरफ़ ख़ुश्की है कितनी, एक तरफ़ कितनी फिसलन
तेरी बातें अब्र-ए-बाराँ, बंजर बंजर तेरे ग़म

काफ़ी थे बस ढाई आखर हर गुत्थी सुलझाने को
पर अपने हिस्से में आए दो ही अक्षर तेरे 'ग़म'

लिख कर कुछ 'अल्फ़ाज़' तुझी पर हम कातिब हो जाते पर
उन सफ़हों के संग जलाए हम ने लिखकर तेरे ग़म

— Saurabh Mehta 'Alfaaz'

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