
कभी हँसता हूँ तो आँखें कभी मैं नम भी रखता हूँ
हर इक मुस्कान के पीछे हज़ारों ग़म भी रखता हूँ
शिफ़ा भी दे नहीं सकता मुझे कोई मेरा अपना
नतीजन मैं मिरे ज़ख़्मों का ख़ुद मरहम भी रखता हूँ
— Shubham Dwivedi
Other sher from the same pen
Shers of bimar.
Voices in the same orbit
Poetry by feeling