naye mausam men phir tum ham milenge dekhna | नए मौसम में फिर तुम हम मिलेंगे देखना

  - Saurabh Mehta 'Alfaaz'

नए मौसम में फिर तुम हम मिलेंगे देखना
तुम्हारे ग़म से अपने ग़म मिलेंगे देखना

किसी ने कह दिया कमतर अरे छोड़ो मियाँ
जहाँ ढूंढोगे ख़ुदस कम मिलेंगे देखना

कभी गर एक जुगनू ने दिखाया हौसला
कई महताब फिर मद्धम मिलेंगे देखना

इधर शिकवे रखे हैं और उधर रुस्वाइयाँ
जिधर देखो यही आलम मिलेंगे देखना

ख़ुदाया है कहाँ तू इस तरफ़ भी देख ले
वगरना हर तरफ़ मातम मिलेंगे देखना

वो जिसकी पीठ पर ख़ंजर के ज़्यादा घाव हैं
उसी के पास हाँ मरहम मिलेंगे देखना

संभलना के लबों को छू न पाएँ उँगलियाँ
दहकती आग से रेशम मिलेंगे देखना

बयाँ 'अल्फ़ाज़' अपनी तिश्नगी जो कर गए
ये सूखे अब्र फिर पुर-नम मिलेंगे देखना

  - Saurabh Mehta 'Alfaaz'

Aag Shayari

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