क्या लिख दूँ?
क्या लिख दूँ इस काग़ज़ पर?
कि जब तुम तक ये पहुँचे
तो महसूस कर सको
सिर्फ़ पढ़ो नहीं
क्या लिख दूँ
कि ये ख़त
सिर्फ़ ख़त ना रह जाए
तुम से झगड़े और जिरह कर पाए
उन बातों के लिए
जो तुम्हारे लिए
शायद सिर्फ़ बातें होंगीं
वो सारे लम्हात
जो तुम्हारे लिए
महज़ कुछ दिन
और कुछ रातें होंगीं
क्या लिख दूँ?
वो शिकायती तंज़?
जो मैं जानता हूँ
नज़रअंदाज़ कर दोगे तुम
या अपनी सारी यादें
सियाही में बाँध कर
एक पुड़िया सी बना दूँ?
कि जब तुम उसे खोलो
तो तुम्हारा ज़ेहन भी महकने लगे उन से
मेरी तरह
— Saurabh Mehta 'Alfaaz'















