Kazim Rizvi

Top 10 of Kazim Rizvi

    नक़्श-ओ-निगार-ए-माज़ी रह रह के याद आए
    दो चार ख़ूँ के क़तरे पलकों पे डगमगाए

    तीरों ने ख़ुद-कुशी की, दम ख़ंजरो का निकला
    बिस्मिल ने हँसते हँसते सीने पे ज़ख़्म खाए

    इस बार भी उदासी हम से सँभल न पाई
    इस बार भी बज़ाहिर हम ख़ूब मुस्कुराए

    सुन अब के इक अनोखी तरकीब मुझ को सूझी
    मैं तुझ को भूल जाऊँ, तू मुझ को भूल जाए

    दिल खोल कर के मैं ने ख़ुद को हदफ़ बनाया
    दिल खोल कर के उस ने सब तीर आज़माए

    मैं अपनी आबरू की मिट्टी पलीद कर दूँ
    लेकिन तेरी अना पर हरगिज़ न हर्फ़ आए

    बस्ती में रहने वाले सब होश खो रहे हैं
    काज़िम से जा के कहिए ग़ज़लें न गुनगुनाए
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    कम अज़ कम इक ज़माना चाहता हूँ
    कि तुम को भूल जाना चाहता हूँ

    ख़ुदारा मुझ को तन्हा छोड़ दीजे
    मैं खुल कर मुस्कुराना चाहता हूँ

    सरासर आप हूँ मद्दे मुक़ाबिल
    ख़ुदी ख़ुद को हराना चाहता हूँ

    मेरे हक़ में उरूस-ए-शब है मक़्तल
    सो उस से लब मिलाना चाहता हूँ

    ये आलम है, कि अपने ही लहू में
    सरासर डूब जाना चाहता हूँ

    सुना है तोड़ते हो दिल सभों का
    सो तुम से दिल लगाना चाहता हूँ

    उसी बज़्म-ए-तरब की आरज़ू है
    वही मंज़र पुराना चाहता हूँ

    नज़र से तीर फैंको हो, सो मैं भी
    जिगर पर तीर खाना चाहता हूँ

    चराग़ों को पयाम-ए-ख़ामुशी दे
    तेरे नज़दीक आना चाहता हूँ
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    ख़िज़ांँ में ग़म, न ख़ुशी आमद-ए-बहार में है
    कि अपना दिल किसी बे दिल के इंतिज़ार में है

    दुरुस्त है, कि ये गुल ख़ूबरू बहुत है मगर
    वो बात गुल में कहाँ, जो हमारे यार में है

    मुक़ाबला जो हसीनों से कर लिया जाए
    तो फिर वो जीत में कब है, जो लुत्फ़ हार में है

    समा दिया है जो हक़ ने तुम्हारी बाँहों में
    कब इतना लुत्फ़ मेरी जान लालाज़ार में है

    मेरी नज़र में मुनाफ़े से कम नहीं काज़िम
    वो हर ज़ियाँ, जो मोहब्बत के कारोबार में है
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    Kazim Rizvi
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    ये हक़ीक़त है, मज़हका नहीं है
    वो बहुत दूर है, जुदा नहीं है

    तेरे होंटों पे रक़्स करता है
    राज़ जो अब तलक खुला नहीं है

    जान ए जांँ तेरे हुस्न के आगे
    ये जो शीशा है, आइना नहीं है

    क्यूँ शराबोर हो पसीने में
    मैं ने बोसा अभी लिया नहीं है

    उस का पिंदार भी वहीं का वहीं
    मेरे लब पर भी इल्तेजा नहीं है

    जो भी होना था हो चुका काज़िम
    अब किसी से हमें गिला नहीं है
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    Kazim Rizvi
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    नाज़-ओ-नख़रे क्या उठाए, क्या सुने उस के गिले
    देखते ही देखते लड़की घमंडी हो गई

    देखते रहने में उस को और क्या होता, मगर
    जो थी जान-ए-आरज़ू, वो चाय ठंडी हो गई
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    ज़बान काटेंगे हक़ सुनाने पे साहिब-ए-इक़्तेदार, तो क्या
    लहू हमारा बग़ैर बोले ज़बाँ दराज़ी किया करेगा
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    तरीक़ा पूछ रहे थे वो शे'र कहने का
    सो मैं ने कह दिया, रातों को देर तक जागो
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    रोते रहना हयात है 'काज़िम'
    रो न पाएँ, तो घुट के मर जाएँ
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    अब किसी और से लाहक़ है मोहब्बत तुझ को
    अब किसी और का चेहरा तेरा आईना है

    अब नहीं मुझ को मुयस्सर तेरे होंटों की शराब
    अब मुझे फिर से वही ख़ून-ए-जिगर पीना है
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    Kazim Rizvi
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    प्यालाअंगबीन क्यूँ हो तुम
    इस क़दर दिल नशीन क्यूँ हो तुम

    तुम को देखूं, तो होश खो बैठूँ
    यार इतने हसीन क्यूँ हो तुम
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