naqsh-o-nigaar-e-maazi rah rah ke yaad aa.e | नक़्श-ओ-निगार-ए-माज़ी रह रह के याद आए

  - Kazim Rizvi

नक़्श-ओ-निगार-ए-माज़ी रह रह के याद आए
दो चार ख़ूँ के क़तरे पलकों पे डगमगाए

तीरों ने ख़ुदकुशी की, दम ख़ंजरो का निकला
बिस्मिल ने हँसते हँसते सीने पे ज़ख़्म खाए

इस बार भी उदासी हम से सँभल न पाई
इस बार भी बज़ाहिर हम ख़ूब मुस्कुराए

सुन अब के इक अनोखी तरकीब मुझ को सूझी
मैं तुझ को भूल जाऊँ, तू मुझ को भूल जाए

दिल खोल कर के मैं ने ख़ुद को हदफ़ बनाया
दिल खोल कर के उस ने सब तीर आज़माए

मैं अपनी आबरू की मिट्टी पलीद कर दूँ
लेकिन तेरी अना पर हरगिज़ न हर्फ़ आए

बस्ती में रहने वाले सब होश खो रहे हैं
काज़िम से जा के कहिए ग़ज़लें न गुनगुनाए

  - Kazim Rizvi

Attitude Shayari

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