तौर सब फ़ितरत के गड़बड़ हो गए
कल जो उल्लू थे, वो गीदड़ हो गए
एक रस्ता जा रहा था सू के क़स्र
सब उसी रस्ते की कीचड़ हो गए
कल न था त्योहार होली का, मगर
सुर्ख़ सब गलियों के नुक्कड़ हो गए
वाह रे कुरसी नशीनों का हुनर
कर के सौ वादे भुलक्कड़ हो गए
आप की तोंदें ज़मीं से जा मिलीं
और अवाम उन नास पापड़ हो गए
ख़ामा-ए-काज़िम से निकले सब हुरूफ़
चेहरा-ए-हाकिम का थप्पड़ हो गए
— Kazim Rizvi















