तुम्हारी सोच से उलटा लिखूँगा
जो जैसा है, उसे वैसा लिंखूँगा
कहूँगा क्या हक़ीक़त के अलावा
हक़ीक़त के अलावा क्या लिखूँगा
जला दोगे मेरी तहरीर, तो क्या
लहू से अपने दोबारा लिखूँगा
क़सीदा क्यूँ लिखूँ हाकिम की ख़ातिर
मैं देहकां के लिए नौहा लिखूँगा
मेरे ख़ूँ में जरासीम-ए-वफ़ा हैं
बजुज़ हर्फ़-ए-मोहब्बत, क्या लिखूँगा
मैं अपने अहद का शाइ'र हूँ काज़िम
सो अपने अहद का क़िस्सा लिखूँगा
— Kazim Rizvi















