itna sach bol ki honton ka tabassum na bujhe | इतना सच बोल कि होंटों का तबस्सुम न बुझे

  - Nida Fazli

इतना सच बोल कि होंटों का तबस्सुम न बुझे
रौशनी ख़त्म न कर आगे अँधेरा होगा

  - Nida Fazli

Raushni Shayari

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    सुख़न-फ़हमों की बस्ती में सुख़न की ज़िन्दगी कम है
    जहाँ शाइर ज़ियादा हैं वहाँ पर शाइरी कम है

    मैं जुगनू हूँ उजाले में भला क्या अहमियत मेरी
    वहाँ ले जाइए मुझको जहाँ पर रौशनी कम है
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    Balmohan Pandey
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    मिरी रौशनी तिरे ख़द्द-ओ-ख़ाल से मुख़्तलिफ़ तो नहीं मगर
    तू क़रीब आ तुझे देख लूँ तू वही है या कोई और है
    Saleem Kausar
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    तो देख लेना हमारे बच्चों के बाल जल्दी सफ़ेद होंगे
    हमारी छोड़ी हुई उदासी से सात नस्लें उदास होंगी
    Danish Naqvi
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    उम्र गुज़री है माँजते ख़ुद को
    साफ़ हैं पर चमक नहीं पाए

    डाल ने फूल की तरह पाला
    ख़ार थे ना महक नहीं पाए
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    Vishal Bagh
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    तिरे बग़ैर अजब बज़्म-ए-दिल का आलम है
    चराग़ सैंकड़ों जलते हैं रौशनी कम है
    Shakeel Badayuni
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    है किसी जालिम उदू की घात दरवाज़े में है
    या मसाफ़त है नई या रात दरवाज़े में है

    जिस तरहा उठती है नजरें बे-इरादा बार-बार
    साफ़ लगता है के कोई बात दरवाजे में
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    Farhat Abbas Shah
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    आप क्या आए कि रुख़्सत सब अंधेरे हो गए
    इस क़दर घर में कभी भी रौशनी देखी न थी
    Hakeem Nasir
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    चाँद भी हैरान दरिया भी परेशानी में है
    अक्स किस का है कि इतनी रौशनी पानी में है
    Farhat Ehsaas
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    अब ऐसे ज़ाविए पर लौ रखी जाने लगी है
    चराग़ों के तले भी रोशनी जाने लगी है

    नया पहलू सलीक़े से बयाँ करना पड़ेगा
    कहानी अब तवज्जोह से सुनी जाने लगी है
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    Khurram Afaq
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    रोशनी बढ़ने लगी है शहर की
    चाँद छत पर आ गया है देखिए
    Divy Kamaldhwaj
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    दुआ सलाम में लिपटी ज़रूरतें माँगे
    क़दम क़दम पे ये बस्ती तिजारतें माँगे

    कहाँ हर एक को आती है रास बर्बादी
    नए सफ़र की मसाफ़त ज़िहानतें माँगे

    चमकते कपड़े महकता ख़ुलूस पुख़्ता मकाँ
    हर एक बज़्म में इज़्ज़त हिफ़ाज़तें माँगे

    कोई धमाका कोई चीख़ कोई हंगामा
    लहू बदन का लहू की शबाहतें माँगे

    कोई न हो मिरे तिरे अलावा बस्ती में
    कभी कभी यही जज़्बा रिक़ाबतें माँगे
    Read Full
    Nida Fazli
    बे-नाम सा ये दर्द ठहर क्यूँ नहीं जाता
    जो बीत गया है वो गुज़र क्यूँ नहीं जाता
    Nida Fazli
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    कुछ भी बचा न कहने को हर बात हो गई
    आओ कहीं शराब पिएँ रात हो गई
    Nida Fazli
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    नक़्शा ले कर हाथ में बच्चा है हैरान
    कैसे दीमक खा गई उस का हिन्दोस्तान
    Nida Fazli
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    वक़्त बंजारा-सिफ़त लम्हा ब लम्हा अपना
    किस को मालूम यहाँ कौन है कितना अपना

    जो भी चाहे वो बना ले उसे अपने जैसा
    किसी आईने का होता नहीं चेहरा अपना

    ख़ुद से मिलने का चलन आम नहीं है वर्ना
    अपने अंदर ही छुपा होता है रस्ता अपना

    यूँ भी होता है वो ख़ूबी जो है हम से मंसूब
    उस के होने में नहीं होता इरादा अपना

    ख़त के आख़िर में सभी यूँ ही रक़म करते हैं
    उस ने रस्मन ही लिखा होगा तुम्हारा अपना
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    Nida Fazli

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