"वक़्त"

ये वक़्त ही है जिस ने
किसू को दुख में हँसा दिया
किसू को ख़ुशी में रुला दिया
किसू को दिन में सुला दिया
किसू को शब में उठा दिया
ये वक़्त ही है जो
कभू घर को उजाड़ दे
कभू घर को सँवार दे
कभू दे सब्ज़ जा-ब-जा
कभू बहार छीन ले
ये कौन है ये कौन है
ये वक़्त है ये वक़्त है
उसूल का सख़्त है
जब इसने पासे पलट दिए
फ़क़ीर सेठ हो गए
चूहे शे'र हो गए
इसी से लाठियाँ चलीं
इसी से हस्तियाँ मिटीं
इसी से बाज़ियाँ कटीं
इसी से बस्तियाँ जलीं
इसी से गोलियाँ चलीं
वक़्त की जंग में
किसू ने हाथ खो दिया
किसू ने कुछ गँवा दिया
ये वक़्त ही है जिस ने
एक से एक धुरंधर को
माटी में मिला दिया
बुलंद जिस के हौसले
क़दर जो वक़्त की जानता
वक़्त उसी का हसीन है
जिस का वक़्त हसीन है
समझो वो नवाब है
जो इस से अनजान है
उस का वक़्त ख़राब है

— Prashant Kumar

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