मौत तू ही गले लगा ले आ
इस ज़माने में कौन है अपना
फ़र्क है इल्म में तिरे मेरे
तू पढ़े है किताब मैं दुनिया
फ़र्क है तेरे मेरे नश्शे में
तू पिए जाम मैं ग़म-ए-दुनिया
फ़र्क है परवरिश में तेरी मिरी
तू रहा घर मैं साग़र-ओ-मीना
बे-वजह ही किसी पे दोष धरें
ज़िंदगी ने किया हमें रुस्वा
— Prashant Kumar















