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दिल में रक्खा फिर यकायक बे-दयार उस ने किया
ऐसा मेरे साथ जाने कितनी बार उस ने किया
ऐसा मेरे साथ जाने कितनी बार उस ने किया
देख कर भी मैं ने अनदेखा किया कितनी दफ़ा
और उधर कानों सुनी पर ए'तिबार उस ने किया
चाहता तो मार सकता था मुझे आसानी से
जाने क्यूँ दिल पर मेरे किश्तों में वार उस ने किया
ख़ुश्क होना आँखों का अच्छा नहीं लगता उसे
इस लिए आँखों को मेरी आबशार उस ने किया
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इक मकीं था जो यहाँ रहता था बरसों पहले
आस में उस की हमेशा ये मकाँ रहता है
आस में उस की हमेशा ये मकाँ रहता है
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ताज़ा हैं ज़ख़्म आज भी पिछली बहार के
सब याद हैं करम मुझे उस ग़म गुसार के
सब याद हैं करम मुझे उस ग़म गुसार के
वो दूसरों से करता रहा वादे प्यार के
परखच्चे उड़ गए मेरे ही ए'तिबार के
कब आएगी ये मौत मुझे कब मिलेगा चैन
दिन ख़त्म होंगे कब मेरे ये इंतिज़ार के
रुकता नहीं कोई भी मुसाफ़िर हैं सब यहाँ
हर कोई छोड़ जाता है कुछ दिन गुज़ार के
मैं भूल बैठा था मेरी औक़ात इश्क़ में
तू ने सही किया मुझे दिल से उतार के
पत्थर सड़क किनारे पड़ा रहता सारी उम्र
लगते नहीं हथौड़े अगर शिल्पकार के
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सभी ने देखा बस चेहरा हमारा
किसी ने दिल नहीं देखा हमारा
किसी ने दिल नहीं देखा हमारा
नहीं टिक पाया इक रिश्ता हमारा
हमें ले डूबा ये ग़ुस्सा हमारा
तुम्हें हाँ की थी अच्छा सोच कर पर
ग़लत निकला है अंदाज़ा हमारा
जहाँ में बाँटता फिरता है वो इश्क़
जो होना चाहिए हिस्सा हमारा
मिले जब जिस्म आपस में हमारे
तो रिश्ता हो गया गहरा हमारा
बड़ी आसानी से बोला उन्होंने
'करन' अब कुछ नहीं लगता हमारा
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लोग तब तलक साथ चलते हैं
जब तक उन के मतलब निकलते हैं
जब तक उन के मतलब निकलते हैं
बिक चुका है ईमान लोगों का
दिल हर एक शय पर फिसलते हैं
आज कल के लोगों को क्या पता
रिश्ते किस तरह से सँभलते हैं
हो भी सकती हैं मंज़िलें अलग
चल अभी तो हम साथ चलते हैं
उम्र जैसे जैसे बदलती है
शौक़ उस तरह ही बदलते हैं
ग़म भी अच्छे लगते हैं सुनने में
शा'इरी में ग़म जब भी ढलते हैं
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